पद — मीरा
कवि परिचय
मीरा (जन्म: सन् 1503, चोकड़ी गाँव, मारवाड़, राजस्थान) भक्तिकाल की सगुण धारा की कृष्णभक्त कवयित्री हैं। उनका विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज से हुआ था। विवाह के कुछ ही वर्षों बाद पहले पति का, फिर पिता और श्वसुर का देहांत हो गया। संसार से विरक्त होकर मीरा श्रीकृष्ण की दीवानी हो गईं — साधु-संतों के साथ हरि-कीर्तन में नाचती-गाती रहीं। परिवार वालों (राणा) ने उन्हें अनेक कष्ट दिए — विष का प्याला, साँप का पिटारा भेजे जाने की कथाएँ प्रसिद्ध हैं — परंतु उनकी भक्ति अडिग रही। उनके इष्ट गिरधर गोपाल थे और वे दैन्य तथा माधुर्य भाव की भक्ति करती थीं। उनकी भाषा मुख्यतः राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है, जिसमें गुजराती, पंजाबी, खड़ी बोली के प्रयोग भी मिलते हैं। प्रमुख कृतियाँ — मीरा पदावली। देहावसान सन् 1546 के आसपास द्वारका में माना जाता है।
पदों का भावार्थ
पहला पद — हरि आप हरो जन री भीर
हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप शरीर।
बूड़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
दासी मीरा लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर॥
मीरा श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं — हे हरि! जैसे आपने सदा अपने भक्तों की पीड़ा (भीर) हरी है, वैसे ही मेरी पीड़ा भी दूर कीजिए। भरी सभा में जब दुःशासन द्रौपदी का चीर खींच रहा था, तब आपने चीर बढ़ाकर उसकी लाज रखी। अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आपने नरसिंह (नरहरि) का रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया। जब मगरमच्छ ने गजराज (हाथी) को पकड़कर डुबोना चाहा, तब आपने उसे बचाकर उसकी पीड़ा काट दी। मीरा कहती हैं — मैं तो आपकी दासी हूँ, हे गिरधर लाल! जैसे आपने इन सबका उद्धार किया, वैसे ही मेरे दुख भी हर लीजिए। इस पद में मीरा की दैन्य भाव की भक्ति प्रकट होती है — वे स्वयं को दासी कहकर प्रभु से रक्षा की गुहार लगाती हैं।
दूसरा पद — स्याम म्हाने चाकर राखो जी
स्याम म्हाने चाकर राखो जी,
गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी।
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ।
बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ॥
मीरा श्रीकृष्ण से विनती करती हैं — हे श्याम! मुझे अपनी चाकर (सेविका) बनाकर रख लीजिए। सेविका बनकर मैं आपके लिए बाग लगाऊँगी, प्रतिदिन सुबह उठकर आपके दर्शन पाऊँगी और वृंदावन की कुंज गलियों में आपकी (गोविंद की) लीलाओं का गुणगान करूँगी। सेवा के बहाने वे प्रभु का निरंतर सान्निध्य चाहती हैं।
चाकरी में दरसण पाऊँ, सुमरण पाऊँ खरची।
भाव भगती जागीरी पाऊँ, तीनूं बाताँ सरसी॥
मीरा कहती हैं कि इस चाकरी से उन्हें तीन लाभ एक साथ मिल जाएँगे — दर्शन (सेवा के रूप में), स्मरण रूपी खर्ची (वेतन) और भाव-भक्ति रूपी जागीर। अर्थात् दर्शन, स्मरण और भक्ति — तीनों बातें सध जाएँगी। यहाँ मीरा ने सांसारिक नौकरी के रूपक (चाकरी-खरची-जागीरी) से आध्यात्मिक लाभों को व्यक्त किया है।
मोर मुगट पीताम्बर सोहै, गल वैजन्ती माला।
बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला॥
मीरा अपने आराध्य के रूप-सौंदर्य का चित्रण करती हैं — श्रीकृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट है, तन पर पीतांबर (पीला वस्त्र) शोभा दे रहा है और गले में वैजयंती माला है। वे मुरली बजाने वाले मोहन वृंदावन में गाएँ चराते हैं। यह माधुर्य भाव की भक्ति का सुंदर उदाहरण है।
हरे हरे नित बाग लगाऊँ, बिच बिच राखूँ क्यारी।
साँवरिया रा दरसण पाऊँ, पहर कुसुम्बी साड़ी।
जोगी आया जोग करण कूँ, तप करण्या संन्यासी।
हरी भजन कूँ साधू आया, बिन्दरावन रा बासी॥
मीरा रे प्रभु गहर गंभीरा, सदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसण दीन्हों, प्रेमनदी रे तीरा॥
मीरा कहती हैं — मैं नित्य हरे-भरे बाग लगाऊँगी, बीच-बीच में क्यारियाँ बनाऊँगी और कुसुम्बी (केसरिया) साड़ी पहनकर अपने साँवरिया के दर्शन करूँगी। वृंदावन में योगी योग करने, संन्यासी तप करने और साधु हरि-भजन करने आते हैं — ऐसे पावन वृंदावन में ही मैं बसना चाहती हूँ। अंत में मीरा कहती हैं कि उनके प्रभु गहरे और गंभीर हैं, सदा धीर रहते हैं; उन्होंने आधी रात को प्रेम-नदी के तीर पर दर्शन दिए — अर्थात् सच्ची प्रेम-साधना से ही प्रभु के दर्शन संभव हैं।
काव्य-सौंदर्य / अलंकार
- भाषा: राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा — सहज, संगीतात्मक और भावपूर्ण; पद गेय हैं।
- भक्ति भाव: पहले पद में दैन्य भाव, दूसरे पद में माधुर्य/सेवक (दास्य) भाव।
- अनुप्रास अलंकार: "चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ", "मोर मुगट", "गहर गंभीरा"।
- रूपक अलंकार: "भाव भगती जागीरी", "सुमरण खरची", "प्रेमनदी" (प्रेम रूपी नदी)।
- पुनरुक्ति प्रकाश: "हरे हरे", "बिच बिच"।
- उदाहरण/दृष्टांत शैली: द्रौपदी, प्रह्लाद (नरहरि) और गजराज के पौराणिक प्रसंगों का प्रयोग।
- छंद: गेय पद-शैली; संगीत के मेल से माधुर्य गुण की प्रधानता।
केंद्रीय भाव
दोनों पदों का केंद्रीय भाव है — श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की अनन्य, समर्पित भक्ति। पहले पद में वे भक्त-वत्सल प्रभु के उद्धारक रूपों (द्रौपदी, प्रह्लाद, गजराज के रक्षक) का स्मरण कराकर अपनी पीड़ा हरने की प्रार्थना करती हैं। दूसरे पद में वे प्रभु की चाकर बनकर उनके निरंतर सान्निध्य, दर्शन, स्मरण और भाव-भक्ति की कामना करती हैं। मीरा के लिए कृष्ण ही स्वामी हैं, वही सर्वस्व हैं — लोक-लाज छोड़कर की गई यह भक्ति ही उनके पदों की आत्मा है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भीर | पीड़ा, दुख, संकट |
| चीर | वस्त्र (द्रौपदी की साड़ी) |
| नरहरि | नरसिंह अवतार (आधा नर, आधा सिंह) |
| बूड़तो | डूबते हुए |
| गजराज | हाथियों का राजा |
| कुण्जर | हाथी |
| पीर | पीड़ा |
| चाकर | नौकर, सेवक |
| रहस्यूँ | रहूँगी |
| लगास्यूँ | लगाऊँगी |
| दरसण | दर्शन |
| पास्यूँ | पाऊँगी |
| कुंज गली | लता-वृक्षों से घिरी गलियाँ |
| सुमरण | स्मरण, नाम-जप |
| खरची | खर्च के लिए मिलने वाला धन, वेतन |
| जागीरी | जागीर, संपत्ति |
| सरसी | पूरी हुईं, सध गईं |
| पीताम्बर | पीला वस्त्र |
| वैजन्ती माला | वैजयंती के फूलों/बीजों की माला |
| धेनु | गाय |
| कुसुम्बी | केसरिया/लाल रंग की |
| गहर गंभीरा | गहरे और गंभीर स्वभाव वाले |
| तीरा | किनारा, तट |