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Ch 3मनुष्यता

स्पर्श (काव्य) · मैथिलीशरण गुप्त

मनुष्यता — मैथिलीशरण गुप्त

कवि परिचय

मैथिलीशरण गुप्त (जन्म: 3 अगस्त 1886, चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश) खड़ी बोली हिंदी के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि और द्विवेदी युग के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति के गौरव-गान और नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के कारण उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि मिली। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं — साकेत (महाकाव्य), यशोधरा, भारत-भारती, पंचवटी, जयद्रथ-वध, द्वापर आदि। 'साकेत' में उन्होंने उर्मिला जैसे उपेक्षित पात्र को तथा 'यशोधरा' में गौतम बुद्ध की पत्नी को वाणी दी। स्वाधीनता आंदोलन में गांधीजी से प्रभावित रहे, राज्यसभा के मनोनीत सदस्य बने और उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उनका देहावसान 12 दिसंबर 1964 को हुआ। प्रस्तुत कविता 'मनुष्यता' में कवि ने मनुष्य को परोपकार, त्याग, एकता और उदारता का संदेश दिया है।

स्तबक-वार (छंद-वार) भावार्थ

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परंतु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

कवि कहते हैं — हे मनुष्य! यह समझ लो कि तुम मरणशील (मर्त्य) हो, फिर भी मृत्यु से कभी मत डरो। मरना ही है तो ऐसा जीवन जीकर मरो कि संसार तुम्हें सदा याद रखे। जो केवल अपने लिए जिया, उसका जीना-मरना दोनों व्यर्थ हैं; सच में वही नहीं मरता जो दूसरों के लिए जीता है। केवल अपने लिए चरना (खाना-कमाना) तो पशु की प्रवृत्ति है — सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरे मनुष्यों के काम आए, उनके लिए मर मिटे। ऐसी मृत्यु ही 'सुमृत्यु' है।

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

जो मनुष्य उदार है, परोपकारी है — उसी की कथा सरस्वती (विद्या, साहित्य, इतिहास) गाती है, धरती उसी के प्रति कृतज्ञता का भाव मानती है। उसकी कीर्ति सदा जीवित रहकर गूँजती है और समस्त सृष्टि उसकी पूजा करती है। जो पूरे असीम विश्व में अखंड आत्मीयता का भाव भर दे — सबको अपना माने — वही सच्चा मनुष्य है।

क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

कवि त्याग के पौराणिक उदाहरण देते हैं — स्वयं भूख से व्याकुल राजा रंतिदेव ने अपने हाथ में रखा भोजन का थाल भी भूखे को दे दिया; महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर के वध हेतु (वज्र बनाने के लिए) परोपकार में अपनी हड्डियाँ तक दान कर दीं; गांधार के राजा उशीनर (शिबि) ने कबूतर की रक्षा के लिए अपना मांस काटकर दे दिया; और वीर कर्ण ने सहर्ष अपने शरीर का कवच-कुंडल (चर्म) दान कर दिया। जब शरीर नश्वर (अनित्य) है और आत्मा अनादि-अमर है, तो देह के मोह में क्या डरना? परोपकार के लिए देह अर्पित करने वाला ही सच्चा मनुष्य है।

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

मनुष्य के पास सहानुभूति और करुणा का भाव होना चाहिए — यही सबसे बड़ी संपत्ति (महाविभूति) है। इसी गुण से पूरी धरती वश में हो जाती है। महात्मा बुद्ध ने करुणा से प्रेरित होकर अपने समय की रूढ़ियों का विरोध किया — उनका यह 'विरुद्धवाद' दया के प्रवाह में बह निकला और संपूर्ण विनम्र लोक-समाज उनके सामने झुक गया। जो परोपकार करता है, वही सच्चा उदार और सच्चा मनुष्य है।

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

कवि चेतावनी देते हैं — तुच्छ धन के नशे में अंधे (मदांध) होकर कभी मत भूलो और स्वयं को सनाथ (सहारे वाला) मानकर घमंड मत करो। इस संसार में अनाथ कौन है? तीनों लोकों के स्वामी ईश्वर सबके साथ हैं; उस दयालु दीनबंधु के हाथ बड़े विशाल हैं। जो ईश्वर पर भरोसा न रखकर अधीर होता है, वह अत्यंत भाग्यहीन है। धन का घमंड छोड़कर सबको अपना मानने वाला ही मनुष्य है।

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

अनंत आकाश में असंख्य देवता अपनी बड़ी-बड़ी भुजाएँ बढ़ाए खड़े हैं — अर्थात् परोपकारी मनुष्य का स्वागत करने को दैवी शक्तियाँ तत्पर हैं। इसलिए एक-दूसरे का सहारा (परस्पर अवलंब) बनकर सब ऊपर उठो और आगे बढ़ो; निष्कलंक (अपंक) होकर देवताओं की गोद (अमर्त्य-अंक) में स्थान पाओ। ऐसे स्वार्थी बनकर मत रहो कि तुम्हारे कारण किसी दूसरे का काम ही न बने।

'मनुष्य मात्र बंधु है' यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

'प्रत्येक मनुष्य हमारा भाई है' — यही सबसे बड़ा विवेक (समझ) है, क्योंकि सबका पिता एक ही पुराणपुरुष स्वयंभू ईश्वर है। कर्मों के फल के अनुसार मनुष्यों में बाहरी भेद (ऊँच-नीच, अमीर-गरीब) अवश्य दिखते हैं, परंतु आंतरिक रूप से सब एक हैं — इसके प्रमाण स्वयं वेद हैं। यह बड़े अनर्थ की बात है कि भाई ही भाई की पीड़ा न हरे।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

अंत में कवि आह्वान करते हैं — अपने अभीष्ट (इच्छित/कल्याण) मार्ग पर हँसते-खेलते चलो; रास्ते में जो विपत्तियाँ और बाधाएँ आएँ, उन्हें धकेलते हुए बढ़ते चलो। आपसी मेलजोल कभी घटे नहीं और भिन्नता (भेदभाव) कभी बढ़े नहीं। बिना व्यर्क तर्क-वितर्क किए सभी एक ही पथ के सजग यात्री बनो। वही भाव समर्थ है जो स्वयं तरते हुए दूसरों को भी तार दे — स्वयं का कल्याण करते हुए दूसरों का भी कल्याण करे।

काव्य-सौंदर्य / अलंकार

  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ, ओजपूर्ण खड़ी बोली; उद्बोधन (संबोधन) शैली।
  • रस: वीर एवं शांत रस का मिश्रण; उपदेशात्मक स्वर।
  • अनुप्रास अलंकार: "मर्त्य हो न मृत्यु से", "सजीव कीर्ति कूजती", "बड़े विशाल हाथ", "अनंत अंतरिक्ष में अनंत"।
  • यमक/लाटानुप्रास की छटा: "मरो परंतु यों मरो", "आप आप ही चरे", "बंधु ही न बंधु की"।
  • उदाहरण (दृष्टांत) अलंकार: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण और बुद्ध के प्रसंग।
  • पुनरुक्ति: प्रत्येक छंद के अंत में टेक — "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे"।
  • विरोधाभास की झलक: "तारता हुआ तरे", "वृथा मरे, वृथा जिए"।

केंद्रीय भाव

कविता का केंद्रीय भाव है — सच्ची मनुष्यता परोपकार में है। जो मनुष्य केवल अपने लिए जीता है, वह पशु-तुल्य है; सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के हित में जीता और मरता है। कवि ने रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण और बुद्ध के उदाहरणों से त्याग, करुणा और उदारता का महत्त्व बताया है तथा धन के अहंकार से बचने, ईश्वर पर भरोसा रखने, विश्व-बंधुत्व ('मनुष्य मात्र बंधु है') और परस्पर सहयोग से आगे बढ़ने का संदेश दिया है। ऐसा जीवन ही 'सुमृत्यु' का अधिकारी बनता है — जिसे मरने के बाद भी संसार याद रखता है।

कठिन शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मर्त्यमरणशील, जिसकी मृत्यु निश्चित है
सु-मृत्युअच्छी, यशस्वी मृत्यु
वृथाव्यर्थ
उदारदानशील, बड़े हृदय वाला
कृतार्थधन्य, उपकार मानने वाली
कूजतीगूँजती है
क्षुधार्तभूख से व्याकुल
करस्थहाथ में रखा हुआ
परार्थदूसरों के लिए
अस्थिजालहड्डियों का समूह
क्षितीशराजा (धरती का स्वामी)
अनित्यनश्वर, नाशवान
अनादिजिसका आदि (आरंभ) न हो — आत्मा
महाविभूतिसबसे बड़ी संपत्ति
वशीकृतावश में की हुई
महीधरती
मदांधघमंड में अंधा
वित्तधन
सनाथजिसका कोई रक्षक/स्वामी हो
त्रिलोकनाथतीनों लोकों के स्वामी, ईश्वर
परस्परावलंबएक-दूसरे का सहारा
अमर्त्य-अंकदेवताओं की गोद
अपंककलंक-रहित, निष्कलंक
स्वयंभूस्वयं उत्पन्न होने वाला ईश्वर
अंतरैक्यआंतरिक एकता
अभीष्टइच्छित, चाहा हुआ
हेलमेलमेलजोल
अतर्कबिना व्यर्थ तर्क-वितर्क के
परीक्षा-टिप: बोर्ड में सबसे अधिक पूछे जाने वाले बिंदु — (1) 'सुमृत्यु' किसे कहा गया है; (2) रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण — किसने क्या दान किया (चारों नाम-दान जोड़े रटकर जाएँ, MCQ में उलझाते हैं); (3) 'मनुष्य मात्र बंधु है' का आशय; (4) कवि ने किसे 'पशु-प्रवृत्ति' कहा है। टेक-पंक्ति "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे" कविता का सार है — किसी भी भाव-प्रश्न के उत्तर में इसे अवश्य जोड़ें।