बड़े भाई साहब — प्रेमचंद
लेखक परिचय
प्रेमचंद (1880–1936) का जन्म वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। वे हिंदी कथा-साहित्य के शिखर पुरुष माने जाते हैं और उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — गोदान, गबन, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि (उपन्यास) तथा नमक का दारोगा, पूस की रात, बड़े घर की बेटी, ईदगाह (कहानियाँ)। उनकी भाषा सरल, सजीव और व्यावहारिक हिंदुस्तानी है जिसमें मुहावरों का सटीक प्रयोग मिलता है। उनकी रचनाओं में मध्यवर्ग और ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण मिलता है।
विस्तृत सारांश
1. दोनों भाइयों का परिचय
कहानी का कथावाचक (लेखक) और उसके बड़े भाई साहब एक हॉस्टल में रहकर पढ़ते थे। बड़े भाई साहब लेखक से उम्र में पाँच साल बड़े थे, किंतु कक्षा में केवल तीन दर्जे आगे थे। वे पढ़ाई की बुनियाद खूब मज़बूत करना चाहते थे, इसलिए एक-एक कक्षा में दो-दो, तीन-तीन साल लगाते थे। बड़े भाई साहब स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे — हरदम किताब खोले बैठे रहते। पर उनका मन शायद पढ़ाई में नहीं लगता था; वे कॉपियों और किताबों के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तसवीरें बनाया करते, कभी एक ही शब्द या शेर को बार-बार लिखते।
2. छोटे भाई की खेल-प्रवृत्ति और भाई साहब के उपदेश
छोटा भाई (लेखक) पढ़ने में मन नहीं लगाता था। कमरे से निकलकर मैदान में कंकरियाँ उछालना, कागज़ की तितलियाँ उड़ाना, चारदीवारी पर चढ़कर उतरना, गुल्ली-डंडा और कबड्डी खेलना उसे बहुत प्रिय था। लौटने पर बड़े भाई साहब का रौद्र रूप देखना पड़ता। वे उपदेश देते — "अंग्रेज़ी पढ़ना कोई हँसी-खेल नहीं है, दिन-रात आँखें फोड़नी पड़ती हैं।" उनके उपदेशों से लेखक कुछ देर के लिए पढ़ाई का टाइम-टेबिल बनाता, पर टाइम-टेबिल बनते ही उसका पालन न हो पाता और वह फिर खेल में लग जाता।
3. परीक्षा-परिणाम — पहली और दूसरी बार
सालाना इम्तिहान हुआ। बड़े भाई साहब फेल हो गए और लेखक अपने दर्जे में प्रथम आया। दोनों के बीच का अंतर केवल दो साल का रह गया। लेखक के मन में आया कि भाई साहब को आड़े हाथों ले, पर उनके दुख को देखकर चुप रहा। अब लेखक को अपनी विद्या पर कुछ अभिमान हो चला और उसकी स्वच्छंदता बढ़ गई। फिर भी भाई साहब का रोब बना रहा। अगले साल फिर वही हुआ — भाई साहब फिर फेल हुए, लेखक फिर पास होकर दर्जे में प्रथम आया। अब केवल एक दर्जे का अंतर रह गया। लेखक के मन में आया कि भाई साहब अब किस मुँह से उसे डाँटेंगे।
4. अनुभव बनाम किताबी ज्ञान — भाई साहब का अंतिम उपदेश
एक दिन लेखक कनकौआ (पतंग) लूटने के लिए बेतहाशा दौड़ा जा रहा था कि सामने से आते बड़े भाई साहब से टकरा गया। भाई साहब ने उसका हाथ पकड़कर समझाया — "मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा। मुझे दुनिया का, ज़िंदगी का जो तजुरबा है, वह तुम्हें कभी नहीं हो सकता। समझ किताबें पढ़ने से नहीं आती, अनुभव से आती है।" उन्होंने अम्माँ और दादा का उदाहरण दिया जो पढ़े-लिखे न होने पर भी संकट के समय सही निर्णय लेते हैं, और हेडमास्टर साहब का उदाहरण दिया जिनके घर का इंतज़ाम उनकी बूढ़ी, अनपढ़ माँ चलाती हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि वे स्वयं मर्यादा में न रहें तो छोटे भाई को रोकने का उन्हें कोई अधिकार नहीं। इस स्वीकारोक्ति से लेखक का हृदय भाई साहब के प्रति श्रद्धा से भर गया। तभी एक कटा हुआ कनकौआ ऊपर से गुज़रा — बड़े भाई साहब ने स्वयं उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और हॉस्टल की ओर दौड़े। लेखक पीछे-पीछे दौड़ रहा था। यहीं कहानी समाप्त होती है।
मुख्य पात्र / चरित्र-चित्रण
- बड़े भाई साहब — अध्ययनशील, गंभीर, संयमी और कर्तव्यनिष्ठ। वे बड़े होने के दायित्व को समझते हैं, इसलिए अपनी खेलने की इच्छा दबाकर छोटे भाई के सामने आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वे रटंत शिक्षा-प्रणाली के शिकार हैं, पर जीवन के अनुभव का महत्त्व समझते हैं। उनके भीतर एक स्नेही अभिभावक छिपा है।
- छोटा भाई (लेखक/कथावाचक) — खेल-कूद में रुचि रखने वाला, चंचल, किंतु प्रतिभाशाली बालक। बिना अधिक परिश्रम के कक्षा में प्रथम आता है। भाई साहब का आदर करता है और अंत में उनके त्याग को समझकर श्रद्धावनत हो जाता है।
संदेश / उद्देश्य
कहानी का मूल संदेश यह है कि किताबी ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण जीवन का अनुभव है। बड़ों का जीवन-अनुभव छोटों के लिए मार्गदर्शक होता है, भले ही वे परीक्षा में सफल न हों। साथ ही प्रेमचंद ने तत्कालीन रटंत (रटने पर आधारित) शिक्षा-प्रणाली पर व्यंग्य किया है, जो बालकों की स्वाभाविक रुचियों का गला घोंट देती है। कहानी यह भी सिखाती है कि बड़ों को छोटों के सामने मर्यादित आचरण करना चाहिए और छोटों को बड़ों का सम्मान करना चाहिए।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तालीम | शिक्षा |
| बुनियाद | नींव, आधार |
| तजुरबा / तजरबा | अनुभव |
| महीप | राजा |
| मसलन | उदाहरण के लिए |
| इबारत | लेख, लिखावट |
| जमात | कक्षा |
| हर्फ़ | अक्षर |
| निपुण | कुशल, दक्ष |
| अवहेलना | उपेक्षा, तिरस्कार |
| टास्क | दिया गया कार्य |
| कनकौआ | पतंग |
| मुहासिरा | घेराबंदी |
| प्राणांतक | प्राण लेने वाला, अत्यंत कठिन |
| स्वच्छंदता | मनमानी, बंधनहीनता |
| अभिभावक | संरक्षक |