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Ch 7आत्मत्राण

स्पर्श (काव्य) · रवींद्रनाथ ठाकुर

आत्मत्राण — रवींद्रनाथ ठाकुर

कवि परिचय

रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) (जन्म: 7 मई 1861, कोलकाता) विश्वविख्यात कवि, कथाकार, नाटककार, चित्रकार, संगीतकार और दार्शनिक थे — उन्हें 'गुरुदेव' कहा जाता है। उनकी काव्य-कृति 'गीतांजलि' पर उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला — यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। प्रमुख कृतियाँ — गीतांजलि, नैवेद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र और सांध्यगीत (काव्य); गोरा, घरे-बाइरे (उपन्यास); काबुलीवाला आदि कहानियाँ। उन्होंने शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' — दोनों उन्हीं की रचनाएँ हैं। उनका निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ। प्रस्तुत कविता 'आत्मत्राण' मूल बांग्ला से हिंदी में अनूदित प्रार्थना-गीत है, जिसके अनुवादक प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं।

'आत्मत्राण' शीर्षक का अर्थ

आत्मत्राण = आत्मा (स्वयं) का त्राण अर्थात् अपनी रक्षा, अपना उद्धार। कवि ईश्वर से विपदाओं को हटाने की नहीं, बल्कि उनसे स्वयं जूझ सकने की आंतरिक शक्ति माँगता है — यही आत्मत्राण है। यह प्रार्थना सामान्य प्रार्थनाओं से भिन्न है: भक्त सुरक्षा नहीं, संघर्ष का सामर्थ्य माँगता है।

स्तबक-वार भावार्थ

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।

कवि करुणामय ईश्वर से कहता है कि मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि तुम मुझे विपत्तियों से बचाओ या मुझ पर संकट ही न आने दो। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि विपत्ति आने पर मैं कभी उससे भयभीत न होऊँ — निर्भय होकर उसका सामना कर सकूँ।

दुख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।

यदि दुख की पीड़ा से व्यथित मेरे मन को तुम सांत्वना (दिलासा) न दो, तो कोई बात नहीं; परंतु हे करुणामय! इतना अवश्य करना कि मैं सदा दुख पर विजय प्राप्त कर सकूँ — दुख से हारकर टूट न जाऊँ।

कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

यदि संकट के समय कहीं कोई सहायक न मिले, तो भी मेरा अपना बल और पौरुष (पुरुषार्थ, आत्मशक्ति) न डगमगाए। संसार में यदि मुझे हानि ही उठानी पड़े और लाभ केवल छलावा (वंचना) बनकर रह जाए, तो भी मैं मन में अपनी क्षति या पराजय न मानूँ — मेरा मनोबल बना रहे।

मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणामय)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही
वहन कर सकूँ इसे निर्भय।

हे ईश्वर! मैं यह नहीं माँगता कि तुम प्रतिदिन (अनुदिन) मेरी रक्षा करते रहो, मुझे संसार-सागर से पार लगाते रहो। बस इतना हो कि मुझमें स्वयं तरने की — भवसागर पार करने की — निरोग और अखंड (अनामय) शक्ति बनी रहे। तुम मेरे जीवन का बोझ हल्का (लघु) करके मुझे सांत्वना न दो, तो भी कोई बात नहीं; बस मैं उस भार को निर्भय होकर स्वयं वहन कर सकूँ।

नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।

कवि अंत में कहता है — सुख के दिनों में मैं विनम्रता से सिर झुकाकर (नत शिर) क्षण-क्षण (छिन-छिन) तुम्हारे मुख को पहचानता रहूँ, अर्थात् सुख में तुम्हें कभी न भूलूँ और हर सुख में तुम्हारा अनुग्रह देखूँ। और जिस दिन दुख की अँधेरी रात में सारा संसार (निखिल मही) मुझे धोखा दे दे, मुझसे मुँह मोड़ ले — उस दिन भी हे करुणामय! मैं तुम्हारी करुणा पर लेशमात्र भी संदेह (संशय) न करूँ, मेरी आस्था अडिग बनी रहे।

काव्य-सौंदर्य / अलंकार

  • विधा: प्रार्थना-गीत; मूल बांग्ला से अनूदित होने पर भी गीतात्मकता और लय सुरक्षित है।
  • भाषा: तत्सम-प्रधान साहित्यिक खड़ी बोली — त्राण, अनुदिन, अनामय, निखिल, मही जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द।
  • अनुप्रास अलंकार: "बल पौरुष न हिले" — वर्ण-आवृत्ति; "तरने... शक्ति अनामय"।
  • पुनरुक्ति प्रकाश: "छिन-छिन"।
  • रूपक: "दुख-रात्रि" — दुख रूपी रात्रि; भवसागर से 'तरने' का प्रतीक।
  • टेक-शैली: "यह मेरी प्रार्थना नहीं", "नहीं सही", "करुणामय" की आवृत्ति से प्रार्थना का प्रभाव गहरा होता है।
  • रस/भाव: शांत रस; आस्था, आत्मविश्वास और भक्ति का समन्वय।

केंद्रीय भाव

कविता का केंद्रीय भाव है — ईश्वर से सुरक्षा नहीं, संघर्ष की शक्ति माँगना। सामान्य लोग प्रार्थना में दुखों को दूर करने की याचना करते हैं, परंतु कवि चाहता है कि विपत्तियाँ भले आएँ, वह उनसे भयभीत न हो; दुख पर विजय पा सके; कोई सहायक न मिले तो भी उसका पौरुष न डगमगाए; और सुख-दुख दोनों स्थितियों में ईश्वर के प्रति उसकी आस्था अखंड बनी रहे। यह कविता आत्मनिर्भरता, पुरुषार्थ और अडिग विश्वास का संदेश देती है — सच्ची भक्ति ईश्वर के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं, बल्कि उससे मिली शक्ति से स्वयं संघर्ष करना है।

परीक्षा-टिप: बोर्ड में प्रायः पूछा जाता है — (1) यह कविता अन्य प्रार्थनाओं/प्रार्थना-गीतों से कैसे भिन्न है (सुरक्षा नहीं, संघर्ष-शक्ति की माँग) — यह 5 अंक का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है; (2) 'आत्मत्राण' शीर्षक की सार्थकता; (3) कवि सुख के दिनों में ईश्वर से क्या चाहता है (नत शिर होकर क्षण-क्षण उसका मुख पहचानना); (4) 'अनामय', 'अनुदिन', 'निखिल मही' के अर्थ (1 अंक); (5) अनुवादक का नाम — हजारीप्रसाद द्विवेदी और मूल कृति गीतांजलि (बांग्ला) से संबंध। टेक-पंक्तियाँ "विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं" भाव-सहित याद रखें।

कठिन शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आत्मत्राणअपनी रक्षा, स्वयं का उद्धार
विपदाविपत्ति, संकट
करुणामयकरुणा से भरे हुए (ईश्वर)
दुख-तापदुख की पीड़ा/जलन
व्यथितदुखी, पीड़ित
चित्तमन, हृदय
सांत्वनादिलासा, ढाढ़स
जय करनाजीतना, विजय पाना
पौरुषपुरुषार्थ, वीरता, आत्मबल
वंचनाधोखा, छल
क्षयनाश, क्षति
त्राणरक्षा, बचाव, उद्धार
अनुदिनप्रतिदिन, हर रोज़
तरनापार उतरना (भवसागर से)
अनामयरोग-रहित, स्वस्थ, निर्विकार
भारबोझ
लघुछोटा, हल्का
वहन करनाउठाना, सहन करना
नत शिरझुका हुआ सिर, विनम्रतापूर्वक
तवतुम्हारा
छिन-छिनक्षण-क्षण, हर पल
निखिल महीसमस्त संसार, सारी पृथ्वी
संशयसंदेह, शक