तताँरा-वामीरो कथा — लीलाधर मंडलोई
लेखक परिचय
लीलाधर मंडलोई का जन्म सन् 1954 में छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) के गुड़ीचौरई गाँव में हुआ। वे प्रसिद्ध कवि, गद्यकार और प्रसारण-अधिकारी रहे हैं तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से लंबे समय तक जुड़े रहे। नौकरी के सिलसिले में वे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में रहे, जहाँ उन्होंने वहाँ की लोककथाओं, जनजीवन और संस्कृति को निकट से देखा। 'हुदहुद', 'घर-घर घूमा', 'रात-बिरात', 'मगर एक आवाज़' उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। प्रस्तुत पाठ उनकी पुस्तक 'अंडमान-निकोबार की लोककथाएँ' से लिया गया है। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहज मिठास और कवित्वपूर्ण चित्रात्मकता मिलती है।
विस्तृत सारांश
तताँरा का परिचय
यह अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की प्रचलित लोककथा है। छोटे-छोटे द्वीपों की इस शृंखला में लिटिल अंडमान और कार-निकोबार आज अलग-अलग हैं, पर लोकमान्यता है कि कभी ये एक ही द्वीप थे। इसी विभाजन की कथा तताँरा-वामीरो से जुड़ी है। निकोबार के पासा गाँव में तताँरा नामक एक सुंदर, बलिष्ठ और नेक युवक रहता था। वह अत्यंत मददगार था — अपने गाँव के ही नहीं, समूचे द्वीपवासियों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता। दूसरों की सहायता को वह अपना परम कर्तव्य मानता था, इसीलिए सभी गाँवों के लोग उसे प्रेम और सम्मान देते थे तथा पर्व-त्योहारों में उसे विशेष रूप से बुलाते थे। तताँरा सदा अपनी कमर में एक लकड़ी की तलवार बाँधे रहता था। लोगों का विश्वास था कि उस तलवार में अद्भुत दैवीय शक्ति है, यद्यपि तताँरा ने उसका उपयोग कभी किसी के सामने नहीं किया था। वह तलवार उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन चुकी थी।
वामीरो से भेंट
एक शाम तताँरा दिन-भर के परिश्रम के बाद समुद्र किनारे टहलने निकला। सूरज डूब रहा था, समुद्र से ठंडी बयारें आ रही थीं। तभी उसे एक मधुर गीत सुनाई पड़ा। गीत गाने वाली थी लपाती गाँव की सुंदर युवती वामीरो, जो समुद्र की लहरों के बीच बैठी एकटक गा रही थी। अचानक एक ऊँची लहर ने उसे भिगो दिया और उसका गाना रुक गया। तताँरा ने आग्रह किया कि वह गीत पूरा करे, पर वामीरो ने अपरिचित युवक के प्रश्नों पर झुँझलाकर पूछा कि वह कौन है और उसे घूरने का अधिकार किसने दिया। उसने यह भी याद दिलाया कि गाँव की परंपरा के अनुसार वह किसी दूसरे गाँव के अपरिचित युवक से बात नहीं कर सकती। तताँरा ने अपना नाम बताया और सम्मोहित-सा वामीरो को देखता रहा। वामीरो घबराकर चली गई, परंतु दोनों के हृदय में प्रेम का अंकुर फूट चुका था। तताँरा ने जाते-जाते आग्रह किया कि वह कल फिर इसी चट्टान पर आए।
प्रेम और सामाजिक बाधा
अगले दिन दोनों फिर उसी स्थान पर मिले। धीरे-धीरे वे प्रतिदिन लपाती की उसी समुद्री चट्टान पर मौन साक्षात्कार करने लगे — बिना अधिक बोले, केवल एक-दूसरे की उपस्थिति में डूबे रहते। किंतु उनके प्रेम के मार्ग में गाँव की रूढ़िवादी परंपरा बाधा थी — निकोबार की रीति के अनुसार विवाह के लिए वर-वधू का एक ही गाँव का होना आवश्यक था; दूसरे गाँव में विवाह वर्जित था। धीरे-धीरे उनके मिलने की चर्चा फैलने लगी और लपाती के कुछ युवकों ने वामीरो की माँ तक यह बात पहुँचा दी। माँ ने वामीरो को फटकारा, परंतु प्रेम रुकने वाला नहीं था।
पर्व के दिन अपमान और क्रोध
कुछ समय बाद पासा गाँव में पशु-पर्व का आयोजन हुआ, जिसमें हृष्ट-पुष्ट पशुओं के प्रदर्शन के साथ भोजन, नृत्य-संगीत का उत्सव होता है और सभी गाँवों के लोग सम्मिलित होते हैं। वामीरो भी अपनी माँ के साथ आई थी। तताँरा उत्सव में भी बेचैन होकर वामीरो को ढूँढ़ता रहा। वामीरो उसे देखते ही रो पड़ी। रोने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ वहाँ आ पहुँची और क्रोध में आग-बबूला हो उठी। उसने गाँव वालों के सामने तताँरा को अपमानित किया और उसे तरह-तरह से भला-बुरा कहा। गाँव के अन्य लोग भी तताँरा के विरुद्ध हो गए। वामीरो अब भी रोए जा रही थी। अपमान, क्षोभ और असहायता से तताँरा के भीतर क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ा।
द्वीप का विभाजन और बलिदान
क्रोध में तताँरा ने अपनी लकड़ी की तलवार निकाली और अपनी पूरी शक्ति से उसे धरती में घोंप दिया। फिर वह उसे खींचता हुआ द्वीप के अंतिम छोर तक दौड़ता गया। जहाँ-जहाँ तलवार की लकीर खिंचती गई, वहाँ-वहाँ धरती फटती चली गई और द्वीप दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। समुद्र का जल बीच में भर गया। तताँरा दूसरी ओर छिटकी धरती के साथ समुद्र में बहता चला गया और फिर कभी नहीं लौटा। वामीरो पागल-सी होकर उसे सर्वत्र ढूँढ़ती रही, खाना-पीना छोड़ दिया और अंततः वह भी कहीं चली गई; किसी को पता नहीं चला कि वह कहाँ गई। इस प्रकार दोनों प्रेमियों ने प्रेम के लिए बलिदान दे दिया।
परिणाम — रूढ़ि का अंत
इस त्रासद घटना ने निकोबारियों को झकझोर दिया। लोगों ने अनुभव किया कि यह दुखद अंत उनकी अनुचित रूढ़ि के कारण हुआ। तभी से निकोबार में दूसरे गाँवों में भी वैवाहिक संबंध स्थापित करने की स्वस्थ परंपरा शुरू हुई। लोकमान्यता है कि लिटिल अंडमान और कार-निकोबार का विभाजन तताँरा की तलवार से ही हुआ। आज भी निकोबारी तताँरा-वामीरो को श्रद्धा और प्रेम से याद करते हैं।
प्रमुख पात्र व चरित्र-चित्रण
- तताँरा: पासा गाँव का सुंदर, बलिष्ठ और शांत स्वभाव का युवक; परोपकारी और सेवाभावी — पूरे द्वीप समाज में आत्मीय और सम्मानित; कर्तव्यनिष्ठ; सच्चा प्रेमी; आत्मसंयमी होते हुए भी अपमान से आहत होकर क्रोध में भी उसने अपना क्रोध मनुष्यों पर नहीं, धरती पर उतारा — यह उसकी महानता है; प्रेम के लिए आत्मबलिदान करने वाला।
- वामीरो: लपाती गाँव की सुंदर, मधुर कंठ वाली भावुक युवती; आरंभ में गाँव की परंपरा मानने वाली संकोची लड़की, पर प्रेम में दृढ़ और एकनिष्ठ; तताँरा के वियोग में सुध-बुध खोकर अपने प्राणों का मोह त्याग देती है।
- वामीरो की माँ: परंपरावादी, क्रोधी और मर्यादा को सर्वोपरि मानने वाली स्त्री; गाँव की रूढ़ि के आगे बेटी की भावनाओं की उपेक्षा करती है; भरे उत्सव में तताँरा का अपमान करती है — रूढ़िवादी समाज की प्रतिनिधि।
पाठ का संदेश / उद्देश्य
यह लोककथा बताती है कि प्रेम मानवीय जीवन का सर्वोच्च मूल्य है और रूढ़ियाँ जब मनुष्य की भावनाओं को कुचलने लगें तो वे टूटनी ही चाहिए। तताँरा-वामीरो का बलिदान व्यर्थ नहीं गया — उसने समाज की जड़ परंपरा को तोड़कर विवाह की स्वस्थ परंपरा स्थापित की। पाठ यह भी सिखाता है कि सुखद और शांतिपूर्ण जीवन के लिए पुरानी अतार्किक रूढ़ियों की जगह समय के अनुसार नई, मानवीय परंपराओं का निर्माण आवश्यक है। साथ ही तताँरा का चरित्र परोपकार, कर्तव्यनिष्ठा और आत्मसंयम की शिक्षा देता है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रमरत | परिश्रम में लगा हुआ |
| विभक्त | बँटा हुआ, विभाजित |
| आदिम | प्रारंभिक, बहुत पुराना |
| लोककथा | जन-जन में प्रचलित कथा |
| नेक | भला, सज्जन |
| मददगार | सहायता करने वाला |
| तत्पर | तैयार, तुरंत उद्यत |
| किंवदंती | कही-सुनी बात, जनश्रुति |
| विलक्षण | अनोखा, असाधारण |
| अचंभित | हैरान, चकित |
| सम्मोहित | मुग्ध, वशीभूत |
| निर्निमेष | बिना पलक झपकाए |
| बयार | ठंडी मंद हवा |
| संचरित | संचालित, गतिमान |
| झुँझलाना | चिढ़ना, खीझना |
| अन्यमनस्कता | मन कहीं और होने की स्थिति, उदासीनता |
| अफवाह | उड़ती हुई झूठी खबर |
| रूढ़ि | पुरानी जड़ परंपरा |
| आग-बबूला | अत्यंत क्रोधित |
| क्षोभ | गहरा दुख, खिन्नता |
| घोंपना | गाड़ना, धँसाना |
| त्रासदी | दुखांत घटना |