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Ch 11तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

स्पर्श (गद्य) · प्रह्लाद अग्रवाल

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र — प्रह्लाद अग्रवाल

लेखक परिचय

प्रह्लाद अग्रवाल का जन्म सन् 1947 में जबलपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ। वे हिंदी के प्राध्यापक रहे हैं और हिंदी सिनेमा के गंभीर अध्येता के रूप में प्रसिद्ध हैं। किशोरावस्था से ही उन्हें फ़िल्में देखने और उन पर लिखने का जुनून रहा। 'सातवाँ दशक', 'तानाशाह', 'राज कपूर : आधी हकीकत आधा फसाना', 'सुपर स्टार राजेश खन्ना', 'महाबाज़ार के महानायक : अमिताभ बच्चन' आदि उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। प्रस्तुत पाठ में उन्होंने गीतकार-निर्माता शैलेंद्र और उनकी एकमात्र फ़िल्म 'तीसरी कसम' की संवेदनशील कथा कही है।

विस्तृत सारांश

'तीसरी कसम' — एक कालजयी फ़िल्म

सन् 1966 में प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने अपने जीवन की पहली और अंतिम फ़िल्म 'तीसरी कसम' बनाई। यह फ़िल्म प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित थी। इसमें राज कपूर ने गाड़ीवान हीरामन की और वहीदा रहमान ने नौटंकी की बाई हीराबाई की भूमिका निभाई थी। यह फ़िल्म सिनेमा को व्यवसाय नहीं, कला मानने वाले एक कवि-हृदय की तपस्या थी। फ़िल्म को राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने उसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म समेत कई पुरस्कार दिए और मास्को फ़िल्म समारोह में भी वह पुरस्कृत हुई। फिर भी विडंबना यह रही कि इसे खरीदने वाले वितरक नहीं मिले; अधिकांश शहरों में यह प्रदर्शित तक नहीं हुई। लेखक इसे 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' कहते हैं।

शैलेंद्र का आदर्शवाद

शैलेंद्र ने यश और धन की कामना से फ़िल्म नहीं बनाई थी; वह तो उनके भीतर के कलाकार की आत्म-संतुष्टि का प्रयास थी। वे लगभग बीस वर्षों से फ़िल्म-जगत में गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित थे, फिर भी फ़िल्म-निर्माण की बारीकियाँ जानते हुए भी उन्होंने समझौता नहीं किया। उन्हें फ़िल्म की असफलता का पूर्वाभास होते हुए भी उन्होंने दर्शकों की रुचि के नाम पर फ़िल्म में सस्ते और चालू किस्म के दृश्य नहीं जोड़े। उनका विश्वास था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए — कलाकार का यह दायित्व है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करे। यही कारण है कि 'तीसरी कसम' में करुणा, भावप्रवणता और आंचलिक जीवन की सच्चाई अपने शुद्धतम रूप में उतर सकी।

राज कपूर और शैलेंद्र की मैत्री

राज कपूर और शैलेंद्र की मित्रता फ़िल्मी दुनिया के लेन-देन से ऊपर थी। जब शैलेंद्र ने राज कपूर से अपनी फ़िल्म में काम करने का अनुरोध किया तो राज कपूर ने मित्रता निभाते हुए मात्र एक रुपया पारिश्रमिक लेकर काम करना स्वीकार किया — पर साथ ही मज़ाकिया लहजे में 'एडवांस' माँगकर दोस्ती का हक़ भी जताया। राज कपूर ने इस फ़िल्म में अभिनय-कला के शिखर को छुआ। उस समय वे 'संगम' की अपार सफलता से उत्साहित थे और एक साथ चार फ़िल्मों — 'मेरा नाम जोकर', 'अजंता', 'मैं और मेरा दोस्त', 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' — की योजनाएँ बना रहे थे। परंतु 'तीसरी कसम' में वे मुंबइया स्टार राज कपूर नहीं, सचमुच के हीरामन बन गए। लेखक के शब्दों में — उनके अभिनय में मुखड़े पर आवश्यकतानुसार भाव-परिवर्तन की अद्भुत क्षमता दिखी।

फ़िल्म की कलात्मक विशेषताएँ

'तीसरी कसम' ऐसी फ़िल्म थी जिसने रेणु की कहानी को पूरी सच्चाई और आत्मा के साथ परदे पर उतारा। इसमें आंचलिक ग्रामीण जीवन, गाड़ीवान हीरामन का भोलापन और नौटंकी की बाई हीराबाई की तरल संवेदना अपनी संपूर्ण करुणा के साथ व्यक्त हुई है। हीराबाई के मन में हीरामन के लिए जो प्रेम है, वह शरीर की भाषा नहीं, आत्मा की भाषा बोलता है। फ़िल्म के गीत — 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'दुनिया बनाने वाले', 'सजनवा बैरी हो गए हमार' — जीवन के दर्द को गहराई से व्यक्त करते हैं। शैलेंद्र के गीतों की विशेषता ही यह थी कि वे भावों को सर्वसाधारण की भाषा में गहरी अर्थवत्ता के साथ कह देते थे — करुणा भी उनमें निराशा नहीं जगाती, बल्कि जिजीविषा को बढ़ाती है।

बाज़ार की विडंबना और शैलेंद्र का अंत

फ़िल्म की गुणवत्ता सर्वोच्च होते हुए भी वह बाज़ार में असफल रही, क्योंकि उसे बेचने के लिए वितरक ही नहीं मिले। जिन वितरकों की समझ में 'संगम' जैसी चमक-दमक वाली फ़िल्में आती थीं, वे इस सीधी-सादी करुण कथा का मोल नहीं समझ सके। शैलेंद्र इस उपेक्षा से भीतर तक टूट गए। फ़िल्म के असफल होने का गहरा आघात उनके संवेदनशील हृदय ने सह नहीं पाया और फ़िल्म के प्रदर्शन के कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। विडंबना देखिए — जिस फ़िल्म को खरीदने वाले नहीं मिलते थे, वही आज हिंदी सिनेमा की कालजयी क्लासिक मानी जाती है। शैलेंद्र भले चले गए, पर 'तीसरी कसम' के रूप में वे अमर हो गए।

प्रमुख व्यक्ति-चित्र

  • शैलेंद्र: संवेदनशील कवि-गीतकार; यश-धन के प्रति निर्लिप्त; आदर्शवादी कलाकार जो कला से समझौता नहीं करता; रेणु की कथा के प्रति पूर्ण निष्ठावान निर्माता; भावुक — फ़िल्म की व्यावसायिक असफलता का आघात न सह सके।
  • राज कपूर: महान अभिनेता और सच्चा मित्र; मात्र एक रुपये में काम करके मैत्री निभाई; 'तीसरी कसम' में स्टार-छवि त्यागकर हीरामन के पात्र में पूरी तरह ढल गए।
  • हीरामन (पात्र): भोला-निश्छल गाड़ीवान, जिसके हृदय में हीराबाई के लिए अबोध, पवित्र प्रेम है।
  • हीराबाई (पात्र): नौटंकी की बाई होकर भी तरल हृदय वाली स्त्री; हीरामन के निश्छल प्रेम से उसकी आत्मा भीग जाती है — वहीदा रहमान ने इस भूमिका को जीवंत किया।

पाठ का संदेश / उद्देश्य

यह पाठ बताता है कि सच्ची कला बाज़ार के तराजू पर नहीं तौली जा सकती। कलाकार का धर्म है कि वह जनरुचि के नाम पर उथलापन न परोसे, बल्कि रुचियों को परिष्कृत करे। शैलेंद्र का जीवन सिखाता है कि आदर्शों के लिए हानि सहकर भी अडिग रहना ही सच्ची कलाकारी है। साथ ही यह पाठ राज कपूर-शैलेंद्र की निःस्वार्थ मैत्री और कला के प्रति समर्पण का प्रेरक चित्र भी प्रस्तुत करता है।

कठिन शब्दार्थ

शब्दअर्थ
शिल्पकारनिर्माण करने वाला कलाकार
सैल्यूलाइडफ़िल्म की रील का पारदर्शी पदार्थ; परदे पर चित्र प्रस्तुत करने का माध्यम
कालजयीसमय को जीतने वाली, सदा प्रासंगिक
पारिश्रमिकमेहनताना, काम का मूल्य
याराना मस्तीदोस्ताना अंदाज़
नामज़दप्रसिद्ध, नामी
अभिनयअदाकारी, पात्र को जीना
आत्म-संतुष्टिअपने मन की तृप्ति
यशकीर्ति, प्रसिद्धि
तन्मयतातल्लीनता, पूरी तरह डूब जाना
आंचलिककिसी विशेष अंचल (क्षेत्र) से जुड़ा
भावप्रवणभावनाओं से भरा हुआ
जिजीविषाजीने की प्रबल इच्छा
विडंबनाविपरीत/कचोटने वाली स्थिति
उथलापनछिछलापन, गहराई का अभाव
परिष्कारसुधार, माँजना-सँवारना
नावाकिफ़अनजान, अपरिचित
वितरकफ़िल्म खरीदकर सिनेमाघरों तक पहुँचाने वाला व्यापारी
नौटंकीलोकनाट्य शैली
मंतव्यअभिप्राय, इच्छा
परीक्षा-टिप: बोर्ड में सर्वाधिक पूछे जाने वाले बिंदु — (1) 'तीसरी कसम' को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया, (2) राज कपूर द्वारा एक रुपया पारिश्रमिक लेने का प्रसंग (मैत्री-मूल्य), (3) शैलेंद्र का दर्शकों की रुचि संबंधी दृष्टिकोण ('उथलेपन को नहीं थोपना चाहिए'), (4) फ़िल्म को मिले तीनों पुरस्कार बनाम वितरकों का न मिलना — यह विडंबना 3 अंक के प्रश्न में बार-बार आती है। फ़िल्म का आधार — रेणु की 'मारे गए गुलफाम' — 1 अंक में लगभग निश्चित है।