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Ch 21समास

व्याकरण एवं लेखन

समास

दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) के मेल से जब एक नया, संक्षिप्त और सार्थक शब्द बनता है, तो शब्दों के इस मेल को समास कहते हैं। 'समास' का शाब्दिक अर्थ है — संक्षेप। समास में पदों के बीच की विभक्तियाँ (का, की, के, में, से, के लिए आदि) प्रायः लुप्त हो जाती हैं।

उदाहरण — 'राजा का पुत्र' → राजपुत्र; 'रसोई के लिए घर' → रसोईघर

प्रमुख शब्दावली

पारिभाषिक शब्दअर्थउदाहरण
समस्त-पद (सामासिक पद)समास से बना नया शब्दराजपुत्र, यथाशक्ति
समास-विग्रहसमस्त-पद को अलग-अलग करके उसका अर्थ स्पष्ट करनाराजपुत्र = राजा का पुत्र
पूर्वपदसमस्त-पद का पहला पद'राजपुत्र' में 'राज'
उत्तरपदसमस्त-पद का दूसरा/अंतिम पद'राजपुत्र' में 'पुत्र'

परीक्षा-सूत्र: समास का भेद इस बात से तय होता है कि कौन-सा पद प्रधान है — पूर्वपद प्रधान → अव्ययीभाव; उत्तरपद प्रधान → तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु; दोनों पद प्रधान → द्वंद्व; दोनों पद गौण (कोई तीसरा अर्थ प्रधान) → बहुव्रीहि। बोर्ड में व्याकरण खंड में समास से 4-5 बहुविकल्पीय प्रश्न आते हैं — विग्रह करके भेद पहचानने का अभ्यास कीजिए।

समास के भेद

CBSE पाठ्यक्रम के अनुसार समास के छह भेद हैं — (1) अव्ययीभाव, (2) तत्पुरुष, (3) कर्मधारय, (4) द्विगु, (5) द्वंद्व, (6) बहुव्रीहि।

1. अव्ययीभाव समास

जिस समास में पूर्वपद प्रधान तथा अव्यय हो और समस्त-पद क्रियाविशेषण (अव्यय) का कार्य करे, वह अव्ययीभाव समास कहलाता है। पहचान — यथा, आ, प्रति, भर, अनु, बे, हर आदि से आरंभ अथवा शब्दों की पुनरावृत्ति।

समस्त-पदविग्रह
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
आजीवनजीवन-भर
प्रतिदिनप्रत्येक दिन
भरपेटपेट भरकर
यथासंभवजैसा संभव हो
बेखटकेबिना खटके के
हाथों-हाथहाथ ही हाथ में

2. तत्पुरुष समास

जिस समास में उत्तरपद प्रधान हो तथा दोनों पदों के बीच की विभक्ति (कारक-चिह्न) का लोप हो जाए, वह तत्पुरुष समास कहलाता है। लुप्त विभक्ति के आधार पर इसके छह कारक-भेद हैं —

भेदलुप्त विभक्तिसमस्त-पदविग्रह
कर्म तत्पुरुषकोयशप्राप्तयश को प्राप्त
करण तत्पुरुषसे / के द्वाराहस्तलिखितहाथ से लिखित
संप्रदान तत्पुरुषके लिएरसोईघररसोई के लिए घर
अपादान तत्पुरुषसे (अलग होना)ऋणमुक्तऋण से मुक्त
संबंध तत्पुरुषका / की / केराजकुमारराजा का कुमार
अधिकरण तत्पुरुषमें / परजलमग्नजल में मग्न

अन्य बोर्ड-प्रिय उदाहरण — देशभक्ति (देश के प्रति भक्ति), गंगाजल (गंगा का जल), विद्यालय (विद्या के लिए आलय), पथभ्रष्ट (पथ से भ्रष्ट), आपबीती (अपने पर बीती), ग्रामवासी (ग्राम का वासी)।

3. कर्मधारय समास

जिस समास में उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद-उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो, वह कर्मधारय समास कहलाता है। विग्रह में 'है जो', 'के समान', 'रूपी' शब्द आते हैं।

समस्त-पदविग्रहसंबंध
महात्मामहान है जो आत्माविशेषण-विशेष्य
नीलकमलनीला है जो कमलविशेषण-विशेष्य
चंद्रमुखचंद्र के समान मुखउपमान-उपमेय
कमलनयनकमल के समान नयनउपमान-उपमेय
चरणकमलकमल रूपी चरणरूपक
महापुरुषमहान है जो पुरुषविशेषण-विशेष्य

4. द्विगु समास

जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो और समस्त-पद किसी समूह या समाहार का बोध कराए, वह द्विगु समास कहलाता है। विग्रह में 'का समूह/समाहार' आता है।

समस्त-पदविग्रह
त्रिभुजतीन भुजाओं का समाहार
चौराहाचार राहों का समाहार
सप्ताहसात दिनों का समूह
नवरात्रनौ रात्रियों का समूह
पंचवटीपाँच वटों का समाहार
त्रिवेणीतीन वेणियों (नदियों) का संगम/समाहार

5. द्वंद्व समास

जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और विग्रह करने पर उनके बीच 'और', 'या', 'अथवा' लगे, वह द्वंद्व समास कहलाता है। पहचान — समस्त-पद में प्रायः योजक-चिह्न (-) होता है।

समस्त-पदविग्रह
माता-पितामाता और पिता
दिन-रातदिन और रात
सुख-दुखसुख और दुख
लाभ-हानिलाभ या हानि
अन्न-जलअन्न और जल
राजा-रंकराजा और रंक

6. बहुव्रीहि समास

जिस समास में दोनों पद गौण हों और समस्त-पद किसी तीसरे अर्थ (अन्य व्यक्ति/वस्तु) की ओर संकेत करे, वह बहुव्रीहि समास कहलाता है। विग्रह में 'है जो', 'जिसका', 'जिसके', 'वाला' आदि आते हैं।

समस्त-पदविग्रहसंकेतित अर्थ
दशाननदस हैं आनन (मुख) जिसकेरावण
नीलकंठनीला है कंठ जिसकाशिव
पीतांबरपीत (पीले) हैं अंबर (वस्त्र) जिसकेश्रीकृष्ण
चतुर्भुजचार हैं भुजाएँ जिसकीविष्णु
लंबोदरलंबा है उदर जिसकागणेश
चक्रपाणिचक्र है पाणि (हाथ) में जिसकेविष्णु

कर्मधारय और बहुव्रीहि में अंतर

एक ही समस्त-पद प्रसंग के अनुसार दोनों समास हो सकता है — अंतर अर्थ की प्रधानता से पहचानिए।

  • कर्मधारय में उत्तरपद प्रधान रहता है; समस्त-पद का अर्थ पदों में ही सीमित रहता है — 'नीलकंठ' = नीला कंठ (पक्षी-विशेष का नीला गला)।
  • बहुव्रीहि में दोनों पद मिलकर किसी अन्य की ओर संकेत करते हैं — 'नीलकंठ' = नीला है कंठ जिसका, अर्थात शिव

द्विगु और बहुव्रीहि में अंतर

  • द्विगु में संख्यावाचक पूर्वपद समूह का बोध कराता है — 'चतुर्भुज' = चार भुजाओं का समाहार (एक आकृति)।
  • बहुव्रीहि में वही पद किसी अन्य का संकेत करता है — 'चतुर्भुज' = चार हैं भुजाएँ जिसकी, अर्थात विष्णु
  • इसी प्रकार 'त्रिनेत्र' — तीन नेत्रों का समाहार (द्विगु) या तीन हैं नेत्र जिसके अर्थात शिव (बहुव्रीहि)।

परीक्षा-टिप: (1) प्रश्न में दिए गए विग्रह को ध्यान से पढ़िए — 'के अनुसार/भर' → अव्ययीभाव; 'का/को/से/के लिए/में' → तत्पुरुष; 'है जो/के समान' → कर्मधारय; 'का समाहार' → द्विगु; 'और/या' → द्वंद्व; 'जिसका/जिसके... वह' → बहुव्रीहि। (2) बहुव्रीहि की सबसे बड़ी पहचान — विग्रह के अंत में किसी अन्य (रावण, शिव, विष्णु आदि) का बोध। (3) बोर्ड में प्रायः पूछा जाता है — 'निम्नलिखित का विग्रह करके समास का नाम लिखिए' — उत्तर में विग्रह और भेद दोनों अवश्य लिखें।