लघुकथा लेखन
परिभाषा और महत्त्व
लघुकथा गद्य की वह विधा है जिसमें किसी एक घटना या प्रसंग को संक्षिप्त, रोचक और प्रभावशाली ढंग से कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 'लघु' अर्थात छोटी और 'कथा' अर्थात कहानी — यह कम शब्दों में पूरा प्रभाव छोड़ने वाली रचना है, जिसका अंत प्रायः किसी सीख या संदेश के साथ होता है। परीक्षा में प्रायः संकेत-बिंदुओं अथवा अधूरी कहानी के आरंभ के आधार पर लघुकथा पूरी करने को कहा जाता है।
CBSE कोर्स B (2026-27) — अंक-विभाजन व शब्द-सीमा
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| खंड | खंड-घ (रचनात्मक लेखन) |
| अंक | 5 अंक (विकल्प सहित) |
| शब्द-सीमा | लगभग 100-120 शब्द |
| अंक-योजना (लगभग) | कथानक/विषय-वस्तु 2 + क्रमबद्ध प्रस्तुति 2 + भाषा-शुद्धता 1 |
लघुकथा के प्रमुख तत्व
- शीर्षक: छोटा, आकर्षक और कथा के भाव/सीख से जुड़ा — शीर्षक लिखना अनिवार्य है।
- कथानक: एक ही घटना/प्रसंग पर केंद्रित कथा — आरंभ, मध्य (द्वंद्व/समस्या) और अंत (समाधान) का स्पष्ट क्रम।
- पात्र: कम-से-कम पात्र (2-3); पात्रों के नाम सरल हों।
- संवाद: छोटे, स्वाभाविक और पात्रों के अनुकूल संवाद कथा को सजीव बनाते हैं।
- देश-काल/वातावरण: स्थान और परिस्थिति का संक्षिप्त संकेत।
- उद्देश्य/सीख: अंत में जीवनोपयोगी संदेश — इसे अंतिम पंक्ति में 'सीख' के रूप में लिख सकते हैं।
संकेत-बिंदुओं से कथा-विस्तार की विधि
- दिए गए सभी संकेत-बिंदु पढ़कर घटनाओं का क्रम मन में बना लें — कोई बिंदु छूटे नहीं।
- आरंभ: पात्र, स्थान और परिस्थिति का परिचय एक-दो वाक्यों में दें।
- मध्य: समस्या/घटना को विकसित करें; एक-दो छोटे संवाद जोड़ें।
- चरम-बिंदु: कथा का निर्णायक मोड़ — यही पाठक की रुचि का केंद्र है।
- अंत: समाधान और उससे निकली सीख लिखें।
- भूतकाल में लिखें, वाक्य छोटे रखें और अंत में उपयुक्त शीर्षक अवश्य दें (शीर्षक प्रारंभ में लिखा जाता है)।
परीक्षा-सूत्र: लघुकथा में उपदेश देते हुए न लिखें — कथा की घटनाएँ स्वयं सीख तक पहुँचाएँ। संवादों के लिए उद्धरण-चिह्न ("...") का प्रयोग करें। यदि प्रश्न में कहानी का आरंभिक अंश दिया गया हो, तो उसी अंश से जोड़ते हुए आगे की कथा लिखें — नई कहानी न शुरू करें।
हल उदाहरण 1 — परिश्रम का फल
(संकेत-बिंदु: दो मित्र • एक परिश्रमी, एक आलसी • परीक्षा • परिणाम • सीख)
परिश्रम का फल
रामपुर गाँव में मोहन और सोहन नाम के दो घनिष्ठ मित्र रहते थे। मोहन प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठकर पढ़ाई करता, जबकि सोहन दिन-भर खेलता और कहता — "परीक्षा से पहले रात-भर पढ़कर पास हो जाऊँगा।" मोहन समझाता, "बूँद-बूँद से ही घड़ा भरता है, मित्र!" पर सोहन हँसकर टाल देता। बोर्ड परीक्षा आई। मोहन शांत भाव से प्रश्न हल करता गया, जबकि सोहन को प्रश्न-पत्र देखकर पसीना आ गया। परिणाम आया तो मोहन जिले में प्रथम आया और सोहन अनुत्तीर्ण हो गया। सोहन ने आँसू भरकर कहा, "काश! मैंने भी समय का मूल्य समझा होता।" उस दिन से वह भी नियमित परिश्रम करने लगा।
सीख: परिश्रम ही सफलता की कुंजी है; समय पर किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
हल उदाहरण 2 — ईमानदारी का पुरस्कार
(संकेत-बिंदु: गरीब रिक्शाचालक • सवारी का छूटा बटुआ • लौटाने का निर्णय • पुरस्कार • सीख)
ईमानदारी का पुरस्कार
दीनू एक गरीब रिक्शाचालक था। एक शाम उसने एक व्यापारी को स्टेशन पहुँचाया। सवारी के उतरने के बाद उसे सीट पर एक मोटा बटुआ मिला, जिसमें बीस हज़ार रुपये और ज़रूरी कागज़ थे। एक क्षण को मन डोला — "इतने पैसों से बेटी की फीस भर सकता हूँ।" पर अगले ही पल अंतरात्मा बोली, "पराया धन मिट्टी समान।" वह भागकर प्लेटफ़ॉर्म पहुँचा और हाँफते हुए व्यापारी को बटुआ लौटा दिया। व्यापारी की आँखें भर आईं। उसने कहा, "तुम धन के नहीं, मन के धनी हो!" उसने दीनू की बेटी की पूरी पढ़ाई का खर्च उठाने का वचन दिया।
सीख: ईमानदारी सबसे बड़ा धन है; उसका फल देर-सवेर अवश्य मिलता है।
अभ्यास हेतु महत्त्वपूर्ण विषय
- एकता में बल है (संकेत: बूढ़ा किसान • चार झगड़ालू बेटे • लकड़ियों का गट्ठर • सीख)
- लालच बुरी बला है
- जैसी करनी, वैसी भरनी
- सच्ची मित्रता (संकेत: दो मित्र • जंगल • भालू • सीख)
- अभ्यास का महत्त्व / करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
- बड़ों का आदर
परीक्षा-टिप: आम गलतियाँ — (1) शीर्षक या सीख लिखना भूल जाना, (2) एक से अधिक घटनाएँ ठूँसकर कथा को निबंध बना देना, (3) संवाद बिल्कुल न देना, (4) वर्तमान काल में लिखना (कथा प्रायः भूतकाल में लिखी जाती है), (5) शब्द-सीमा से बहुत अधिक लिखना। कथा छोटी हो पर पूरी हो — अधूरा अंत छोड़ने पर अंक कटते हैं।