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Ch 4पर्वत प्रदेश में पावस

स्पर्श (काव्य) · सुमित्रानंदन पंत

पर्वत प्रदेश में पावस — सुमित्रानंदन पंत

कवि परिचय

सुमित्रानंदन पंत (जन्म: 20 मई 1900, कौसानी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड) छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं और 'प्रकृति के सुकुमार कवि' कहलाते हैं। कौसानी की सुरम्य पर्वतीय प्रकृति के बीच पले-बढ़े पंत जी की कविता में प्रकृति सजीव, चेतन और मानवीय रूप में उपस्थित होती है। सात वर्ष की अवस्था से ही वे कविता लिखने लगे थे। प्रमुख कृतियाँ — वीणा, पल्लव, गुंजन, ग्राम्या, युगवाणी, स्वर्णकिरण, लोकायतन, चिदंबरा। उन्हें 'चिदंबरा' पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, 'कला और बूढ़ा चाँद' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा पद्मभूषण सम्मान मिला। उनकी काव्य-यात्रा छायावाद से प्रारंभ होकर प्रगतिवाद और अरविंद-दर्शन तक विकसित हुई। देहावसान 28 दिसंबर 1977 को हुआ। प्रस्तुत कविता में उन्होंने पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु (पावस) के दौरान क्षण-क्षण बदलते प्रकृति के दृश्यों का मानवीकरण-युक्त सजीव चित्रण किया है।

स्तबक-वार भावार्थ

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।

कवि कहते हैं कि पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु (पावस) का समय था। इस ऋतु में पहाड़ों पर प्रकृति का रूप-वेश पल-पल बदलता रहता है — कभी धूप, कभी बादल, कभी वर्षा, कभी कोहरा। प्रकृति मानो हर क्षण नया शृंगार करके नया रूप धारण कर रही हो।

मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार-बार
नीचे जल में निज महाकार,
—जिसके चरणों में पला ताल
दर्पण सा फैला है विशाल!

विशाल पर्वत करधनी (मेखला) के आकार में अर्थात् गोलाकार फैला हुआ है। उस पर खिले हज़ारों फूल ऐसे लगते हैं मानो पर्वत ने अपनी हज़ार पुष्प-रूपी आँखें (दृग-सुमन) फाड़कर खोल ली हों और वह बार-बार अपने चरणों में फैले विशाल तालाब के जल में अपना महाकार (विराट रूप) निहार रहा हो। पर्वत के चरणों में पला हुआ ताल दर्पण के समान विशाल और स्वच्छ फैला है। यहाँ पर्वत का सुंदर मानवीकरण हुआ है — वह मनुष्य की भाँति दर्पण में अपना रूप देख रहा है।

गिरि का गौरव गाकर झर-झर
मद में नस-नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों सी सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर!
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।

पहाड़ से झरते झाग भरे झरने ऐसे लगते हैं मानो वे झर-झर स्वर में पर्वत का गौरव-गान कर रहे हों। उनका कल-कल संगीत सुनने वालों की नस-नस में उत्साह और उमंग भर देता है। ये झरने मोती की लड़ियों के समान सुंदर दिखाई देते हैं। पर्वत (गिरिवर) के हृदय (उर) से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष (तरुवर) आकाश की ओर ऐसे देख रहे हैं मानो वे ऊँची आकांक्षाएँ लिए शांत आकाश को अपलक (अनिमेष), अटल और कुछ चिंतित भाव से निहार रहे हों — मानो अपने लक्ष्य की ऊँचाई पाने की साधना कर रहे हों।

उड़ गया, अचानक लो, भूधर
फड़का अपार पारद के पर!
रव-शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!

तभी अचानक घने बादल और कोहरा छा जाने से पर्वत (भूधर) दिखना बंद हो जाता है — ऐसा लगता है मानो पर्वत पारे के समान चमकीले, अपार पंख (पारद के पर) फड़फड़ाकर कहीं उड़ गया हो। झरने दिखाई नहीं देते, केवल उनकी आवाज़ (रव) शेष रह गई है। मूसलाधार वर्षा ऐसी हो रही है मानो आकाश (अंबर) ही धरती पर टूट पड़ा हो।

धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुआँ, जल गया ताल!
—यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।

कोहरे और धुंध में शाल के ऊँचे वृक्ष ऐसे अदृश्य हो गए मानो डरकर (सभय) धरती में धँस गए हों। ताल से उठती भाप और धुंध ऐसी लगती है मानो तालाब जल गया हो और उससे धुआँ उठ रहा हो। इस प्रकार क्षण-क्षण बदलते इन अद्भुत दृश्यों को देखकर लगता है मानो देवराज इंद्र स्वयं बादल रूपी विमान (जलद-यान) में बैठकर विचरते हुए अपना इंद्रजाल (जादू का खेल) दिखा रहे हों।

काव्य-सौंदर्य / अलंकार

  • मानवीकरण अलंकार: पूरी कविता का प्राण — पर्वत आँखें फाड़कर जल में अपना रूप देखता है, वृक्ष चिंतित होकर आकाश निहारते हैं, शाल के पेड़ डरकर धरती में धँस जाते हैं, इंद्र इंद्रजाल खेलता है।
  • उपमा अलंकार: "दर्पण सा फैला है विशाल" (ताल), "मोती की लड़ियों सी सुंदर" (झरने)।
  • रूपक अलंकार: "दृग-सुमन" (फूल रूपी आँखें), "जलद-यान" (बादल रूपी विमान)।
  • अनुप्रास अलंकार: "पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश", "गिरि का गौरव गाकर झर-झर"।
  • पुनरुक्ति प्रकाश: "पल-पल", "झर-झर", "उठ-उठ", "विचर-विचर", "बार-बार"।
  • अतिशयोक्ति: "है टूट पड़ा भू पर अंबर"।
  • भाषा-शैली: संस्कृतनिष्ठ, चित्रात्मक खड़ी बोली; दृश्य-बिंब योजना अत्यंत सजीव; छायावादी कोमल-कांत पदावली।

केंद्रीय भाव

कविता का केंद्रीय भाव है — वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रकृति की क्षण-क्षण बदलती अद्भुत छटा का चित्रण। कवि ने प्रकृति को जड़ नहीं, बल्कि सजीव और चेतन रूप में देखा है — पर्वत दर्पण में अपना रूप निहारता है, झरने गौरव-गान करते हैं, वृक्ष ऊँची आकांक्षाओं से आकाश निहारते हैं और वर्षा-कोहरे का दृश्य इंद्र का इंद्रजाल बन जाता है। यह छायावादी प्रकृति-चित्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच का भेद मिट जाता है। कविता यह भी संकेत देती है कि प्रकृति के इस विराट सौंदर्य के आगे मनुष्य विस्मित ही रह जाता है।

कठिन शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पावसवर्षा ऋतु
वेशरूप, पहनावा
मेखलाकारकरधनी (कमरबंद) के आकार का, गोलाकार
अपारजिसका पार न हो, विशाल
सहस्रहज़ार
दृग-सुमनफूल रूपी आँखें
अवलोक रहादेख रहा
महाकारविशाल आकार
तालतालाब
दर्पणआईना
गिरिपर्वत
मदमस्ती, उमंग
निर्झरझरना
उरहृदय
उच्चाकांक्षाऊँची आकांक्षा/महत्त्वाकांक्षा
तरुवरबड़े वृक्ष
नीरव नभशांत (मौन) आकाश
अनिमेषबिना पलक झपकाए, अपलक
चिंतापरचिंता में डूबे हुए
भूधरपर्वत (भू को धारण करने वाला)
पारद के परपारे के समान चमकीले पंख
रव-शेषकेवल आवाज़ बाकी रहना
अंबरआकाश
सभयभयभीत होकर
शालएक ऊँचा वृक्ष
जलद-यानबादल रूपी विमान
इंद्रजालजादू का खेल, माया
परीक्षा-टिप: यह कविता अलंकार-प्रश्नों की खान है — 'मेखलाकार', 'दृग-सुमन', 'दर्पण सा', 'मोती की लड़ियों सी' और मानवीकरण के उदाहरण कंठस्थ रखें। बोर्ड में प्रायः पूछा जाता है — (1) पर्वत ताल के जल में क्या देख रहा है और कैसे; (2) 'है टूट पड़ा भू पर अंबर' का आशय; (3) शाल के वृक्ष धरती में क्यों धँस गए प्रतीत होते हैं; (4) कविता में इंद्र किस रूप में और क्या करता दिखाया गया है (जलद-यान में इंद्रजाल)। 'पावस' का अर्थ (वर्षा ऋतु) 1 अंक में अवश्य आता है।