तोप — वीरेन डंगवाल
कवि परिचय
वीरेन डंगवाल (जन्म: 5 अगस्त 1947, कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड) समकालीन हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने बरेली कॉलेज में हिंदी का अध्यापन किया और लंबे समय तक पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। उनकी कविताओं की विशेषता यह है कि वे आम आदमी की रोज़मर्रा की चीज़ों — जैसे तोप, समोसा, पपीता, भाप के इंजन — को कविता का विषय बनाकर उनके भीतर छिपे गहरे सामाजिक-राजनीतिक अर्थ खोल देते हैं। प्रमुख काव्य-संग्रह — 'इसी दुनिया में' तथा 'दुष्चक्र में स्रष्टा' ('दुष्चक्र में स्रष्टा' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला)। उन्होंने पाब्लो नेरुदा और ब्रेख़्त जैसे विश्वप्रसिद्ध कवियों की कविताओं के अनुवाद भी किए। उनका निधन 28 सितंबर 2015 को हुआ। प्रस्तुत कविता 'तोप' में कवि ने कंपनी बाग़ में रखी 1857 की तोप के माध्यम से साम्राज्यवादी शक्तियों के दमन और उनके अनिवार्य अंत की ओर संकेत किया है।
पृष्ठभूमि
ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, परंतु धीरे-धीरे उसने पूरे देश पर शासन जमा लिया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इसी कंपनी की तोपों ने असंख्य भारतीय वीरों को मौत के घाट उतारा था। आज वही तोप कंपनी बाग़ (कंपनी के ज़माने का बना बाग़) के प्रवेश-द्वार पर एक निर्जीव प्रदर्शनी की वस्तु बनकर 'धरोहर' के रूप में रखी है। कवि इसी तोप के बहाने अत्याचारी सत्ता के अंजाम पर व्यंग्य करता है।
स्तबक-वार भावार्थ
कंपनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले
कंपनी बाग़ की तरह
साल में चमकाई जाती है दो बार।
कंपनी बाग़ के प्रवेश-द्वार (मुहाने) पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय की तोप सजाकर रखी गई है। जिस प्रकार अंग्रेज़ों से विरासत में मिले कंपनी बाग़ की खूब देखभाल होती है, उसी प्रकार इस तोप की भी बड़ी सँभाल होती है — इसे वर्ष में दो बार (15 अगस्त और 26 जनवरी को) चमकाया जाता है। कवि का संकेत है कि हम इन धरोहरों को इसलिए सँभालकर रखते हैं ताकि वे हमें ग़ुलामी के दिनों और अत्याचारों की याद दिलाती रहें और हम सचेत रहें।
सुबह-शाम कंपनी बाग़ में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिए थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के धज्जे
अपने ज़माने में।
सुबह-शाम कंपनी बाग़ में सैर करने बहुत से सैलानी आते हैं। यह तोप मानो उन्हें अपना इतिहास बताती है कि अपने ज़माने में मैं बहुत शक्तिशाली (जबर) थी — मैंने 1857 में अच्छे-अच्छे वीर सेनानियों (सूरमाओं) के धज्जे उड़ा दिए थे, अर्थात् असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को मौत के घाट उतारा था। यहाँ तोप का मानवीकरण करते हुए उसके अतीत के दमन-चक्र की याद दिलाई गई है।
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद।
परंतु अब उस भयानक तोप की स्थिति देखिए — छोटे बच्चे उस पर बैठकर घुड़सवारी का खेल खेलते हैं। जब वह बच्चों की घुड़सवारी से खाली (फ़ारिग) होती है, तो चिड़ियाँ उस पर बैठकर गपशप करती हैं। कभी-कभी नन्ही गौरैयें शरारत में उसके भीतर (उसी मुँह में, जो कभी आग उगलता था) घुस जाती हैं। ये नन्ही चिड़ियाँ मानो संदेश देती हैं कि तोप चाहे कितनी भी बड़ी और शक्तिशाली क्यों न हो, एक दिन उसका मुँह बंद होना ही है — अर्थात् अत्याचार और दमन की ताकत चाहे जितनी प्रबल हो, उसका अंत निश्चित है।
काव्य-सौंदर्य / अलंकार
- भाषा: सरल, सहज बोलचाल की खड़ी बोली; उर्दू शब्दों (जबर, बहरहाल, फ़ारिग, सैलानी) का सटीक प्रयोग।
- शैली: व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक — तोप अत्याचारी सत्ता का, चिड़ियाँ निर्भीक स्वतंत्रता का प्रतीक हैं।
- मानवीकरण अलंकार: तोप सैलानियों को अपनी कहानी 'बताती' है; चिड़ियाँ 'गपशप' करती हैं और संदेश 'बताती' हैं।
- अनुप्रास अलंकार: "सुबह-शाम... सैलानी", "अच्छे-अच्छे"।
- पुनरुक्ति प्रकाश: "अच्छे-अच्छे", "कभी-कभी"।
- बिंब-योजना: तोप पर बच्चों की घुड़सवारी और भीतर घुसती गौरैया का दृश्य-बिंब अत्यंत सजीव है।
- छंद: मुक्त छंद (अतुकांत), नई कविता की शैली।
केंद्रीय भाव
कविता का केंद्रीय भाव है — अत्याचारी शक्ति चाहे कितनी भी प्रचंड हो, उसका अंत निश्चित है। जो तोप कभी वीरों के धज्जे उड़ाती थी, आज वह बच्चों का खिलौना और चिड़ियों के बैठने की जगह बनकर रह गई है। नन्ही गौरैया का उसके मुँह में घुस जाना यह सिद्ध करता है कि समय हर बड़े से बड़े दमनकारी का मुँह बंद कर देता है। साथ ही कविता यह संदेश भी देती है कि हमें अपनी विरासत की वस्तुओं को सँभालकर रखना चाहिए, क्योंकि वे इतिहास की सीख देती हैं — ताकि भविष्य में कोई 'कंपनी' फिर हम पर शासन न कर सके।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कंपनी बाग़ | ईस्ट इंडिया कंपनी के समय में बना बाग़ |
| मुहाने पर | प्रवेश-द्वार पर, दहाने पर |
| धर रखी गई | रखी गई, स्थापित की गई |
| सम्हाल | देखभाल, रख-रखाव |
| विरासत | पूर्वजों/पुराने समय से मिली संपत्ति, धरोहर |
| सैलानी | सैर करने वाले, पर्यटक |
| जबर | शक्तिशाली, बलवान |
| सूरमा | वीर, योद्धा |
| धज्जे उड़ाना | नष्ट कर देना, टुकड़े-टुकड़े कर देना |
| बहरहाल | हर हाल में, जो भी हो, फ़िलहाल |
| फ़ारिग | खाली, मुक्त |
| गपशप | इधर-उधर की बातचीत |
| शैतानी | शरारत |
| गौरैया | छोटी घरेलू चिड़िया |
| मुँह बंद होना | शांत/समाप्त हो जाना, बोलती बंद होना |