कर चले हम फ़िदा — कैफ़ी आज़मी
कवि परिचय
कैफ़ी आज़मी (मूल नाम: अख़्तर हुसैन रिज़वी; जन्म: 1919, मिजवाँ, ज़िला आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश) उर्दू के प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े प्रसिद्ध शायर हैं। उन्होंने ग्यारह वर्ष की छोटी अवस्था में ही पहली ग़ज़ल कह दी थी। उनकी शायरी में सामाजिक चेतना, इंसानियत और राजनीतिक सरोकार प्रमुख हैं। प्रमुख काव्य-संग्रह — झंकार, आख़िरे-शब, आवारा सज्दे, सरमाया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान मिले। कैफ़ी आज़मी ने अनेक हिंदी फ़िल्मों के लिए भी यादगार गीत लिखे। प्रस्तुत गीत उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी चेतन आनंद की फ़िल्म 'हक़ीक़त' के लिए लिखा था, जो आज भी देशभक्ति के सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है। उनका निधन 10 मई 2002 को हुआ।
पृष्ठभूमि
यह गीत उन सैनिकों की भावनाओं की अभिव्यक्ति है जो 1962 के युद्ध में देश की रक्षा करते हुए अंतिम साँस तक लड़े। मरते हुए सैनिक अपने देशवासियों को वतन की रक्षा का दायित्व सौंपते हुए विदा ले रहे हैं — इसीलिए गीत की टेक है: "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो"।
स्तबक-वार भावार्थ
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
शहीद होते सैनिक कहते हैं — साथियो! हम अपने प्राण और शरीर देश पर न्योछावर (फ़िदा) करके जा रहे हैं। अब यह वतन तुम्हारे हवाले है — इसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी अब तुम देशवासियों की है। यही पंक्ति पूरे गीत में टेक (स्थायी) के रूप में दोहराई गई है।
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
सैनिक कहते हैं कि हिमालय की बर्फ़ीली ऊँचाइयों पर लड़ते हुए हमारी साँसें थमती गईं और ठंड से नब्ज़ (नाड़ी) जमती गई, फिर भी हमने अपने बढ़ते कदमों को रुकने नहीं दिया। हमें अपने सिर कटने का कोई दुख नहीं, क्योंकि हमने हिमालय का सिर — अर्थात् देश का गौरव और सम्मान — झुकने नहीं दिया। मरते-मरते भी हमारा वीरों वाला बाँकपन (शान, वीरता का अंदाज़) बना रहा।
ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क़ दोनों को रुसवा करे
वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
ज़िंदा रहने के अवसर तो जीवन में बहुत मिलते हैं, परंतु देश के लिए प्राण न्योछावर करने का मौसम (रुत) रोज़ नहीं आता — यह सौभाग्य किसी-किसी को ही मिलता है। जो जवानी देश के लिए खून में नहीं नहाती — अर्थात् बलिदान नहीं देती — वह सौंदर्य (हुस्न) और प्रेम (इश्क़) दोनों को लज्जित (रुसवा) करती है। आज मातृभूमि शहीदों के लाल रक्त से सजकर दुलहन के समान सुशोभित हो रही है — उसके लिए प्राण देना ही सच्चा प्रेम है।
राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले
बाँधो अपने सरों से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
सैनिक देशवासियों से आग्रह करते हैं कि बलिदान (कुर्बानी) का यह मार्ग कभी सूना (वीरान) न होने पाए — तुम बलिदानियों के नए-नए काफ़िले सजाते रहना, अर्थात् देश-रक्षा के लिए नई पीढ़ियाँ आगे आती रहें। विजय (फ़तह) का उत्सव बलिदान के इस उत्सव के बाद ही आता है। आज ज़िंदगी हँसते-हँसते मौत के गले मिल रही है — अर्थात् सैनिक प्रसन्नता से मृत्यु का वरण कर रहे हैं। साथियो! अब तुम भी सिर पर कफ़न बाँध लो — बलिदान के लिए सदा तैयार रहो।
खींच दो अपने खूँ से ज़मीं पर लकीर
इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
अंतिम बंद में रामायण के प्रतीकों का सुंदर प्रयोग है। सैनिक कहते हैं — अपने खून से धरती पर (सीमा पर) ऐसी लक्ष्मण-रेखा खींच दो कि कोई रावण रूपी शत्रु उसे पार करके इस ओर न आ सके। यदि किसी शत्रु का हाथ भारत माता रूपी सीता के दामन (आँचल) की ओर उठे, तो उस हाथ को तोड़ डालो। इस देश की मर्यादा की रक्षा के लिए अब तुम्हें ही राम और तुम्हें ही लक्ष्मण बनना है — यहाँ भारतभूमि को सीता, शत्रु को रावण तथा देशवासियों को राम-लक्ष्मण के रूप में चित्रित किया गया है।
काव्य-सौंदर्य / अलंकार
- भाषा: उर्दू-हिंदी मिश्रित सरल, संगीतात्मक और भावपूर्ण गीत-शैली; 'फ़िदा', 'रुसवा', 'फ़तह', 'काफ़िले' जैसे उर्दू शब्दों का सहज प्रयोग।
- प्रतीक-योजना: सीता = भारतभूमि/देश की मर्यादा, रावण = आक्रमणकारी शत्रु, राम-लक्ष्मण = देशवासी/सैनिक, लकीर = खून से खींची लक्ष्मण-रेखा (सीमा), कफ़न बाँधना = बलिदान की तैयारी।
- रूपक अलंकार: "धरती बनी है दुलहन" — रक्त से सजी धरती का दुलहन रूप।
- अनुप्रास अलंकार: "जश्न... जश्न", "हाथ अगर हाथ", "राह... रुत... रोज़" में वर्ण-आवृत्ति।
- विरोधाभास: "ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले" — जीवन-मृत्यु का मिलन।
- पुनरुक्ति/टेक: "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो" की आवृत्ति गीत को प्रभावशाली बनाती है।
- रस: वीर रस प्रधान; करुण रस का भी स्पर्श।
केंद्रीय भाव
गीत का केंद्रीय भाव है — देश के लिए सर्वोच्च बलिदान और देशवासियों को वतन की रक्षा का दायित्व सौंपना। शहीद होते सैनिक गर्व से कहते हैं कि उन्होंने अंतिम साँस तक देश का मस्तक झुकने नहीं दिया। वे चाहते हैं कि बलिदान की यह परंपरा कभी रुके नहीं — हर देशवासी सिर पर कफ़न बाँधकर राम-लक्ष्मण की भाँति भारत माता रूपी सीता की मर्यादा की रक्षा करे। यह गीत बलिदान को शोक नहीं, उत्सव मानता है और देशप्रेम को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बताता है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| फ़िदा | न्योछावर, कुर्बान |
| जानो-तन | प्राण और शरीर |
| हवाले | सौंपना, सुपुर्द करना |
| वतन | देश, मातृभूमि |
| नब्ज़ | नाड़ी |
| बाँकपन | वीरता भरी शान, तिरछा अंदाज़ |
| रुत | ऋतु, मौसम, अवसर |
| हुस्न | सौंदर्य |
| इश्क़ | प्रेम |
| रुसवा | बदनाम, लज्जित |
| खूँ | खून, रक्त |
| वीरान | सुनसान, उजाड़ |
| काफ़िला | यात्रियों का समूह, कारवाँ |
| फ़तह | विजय, जीत |
| जश्न | उत्सव, खुशी का समारोह |
| कफ़न | शव को लपेटने का वस्त्र; कफ़न बाँधना = मरने को तैयार रहना |
| लकीर | रेखा (यहाँ लक्ष्मण-रेखा के अर्थ में) |
| दामन | आँचल, वस्त्र का छोर |