अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले — निदा फ़ाज़ली (निबंध)
पाठ्यपुस्तक: स्पर्श भाग-2 | विधा: निबंध (आत्मकथात्मक शैली) | कोड 085, हिंदी पाठ्यक्रम-ब
लेखक परिचय
निदा फ़ाज़ली (1938–2016) का जन्म दिल्ली में हुआ और शिक्षा ग्वालियर में। विभाजन के समय उनके माता-पिता पाकिस्तान चले गए, पर उन्होंने भारत में ही रहना चुना। वे उर्दू के प्रसिद्ध शायर, गीतकार और गद्यकार थे। सरल भाषा में गहरी मानवीय संवेदना उनकी पहचान है। 'लफ़्ज़ों के फूल', 'मोर नाच', 'खोया हुआ सा कुछ' उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं; आत्मकथा के दो भाग — 'दीवारों के बीच' और 'दीवारों के बाहर' — बहुत चर्चित रहे। प्रस्तुत पाठ उनकी आत्मकथात्मक कृति 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है।
विस्तृत सारांश
1. बाइबिल का सोलोमन और पक्षियों की दुआ
लेखक बताता है कि बाइबिल के सोलोमन (जिन्हें कुरआन में सुलेमान कहा गया है) केवल मनुष्यों के ही नहीं, सारे प्राणियों के राजा थे और पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे। एक बार वे अपने लश्कर के साथ रास्ते से गुज़र रहे थे तो एक चींटी ने दूसरी चींटियों से कहा — जल्दी अपने-अपने बिलों में चलो, वरना सुलेमान की फ़ौज तुम्हें कुचल देगी। सुलेमान ने मुसकराकर कहा — घबराओ नहीं, मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं, सबके लिए मुहब्बत हूँ। यह प्रसंग बताता है कि सच्चा शासक वही है जो छोटे-से-छोटे जीव के प्रति भी करुणा रखता है।
2. नूह और घायल कुत्ता
इसी तरह लेखक नूह (असली नाम लशकर, ईरानी भाषा में नूह) का प्रसंग सुनाता है। नूह ने एक बार एक घायल कुत्ते को दुत्कारते हुए कहा — "दूर हो जा गंदे कुत्ते!" कुत्ते ने जवाब दिया — "न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान; बनाने वाला तो दोनों का एक ही है।" यह सुनकर नूह इतने दुखी हुए कि उम्र-भर रोते रहे — इसीलिए उन्हें अरब में 'नूह' के लक़ब (उपाधि) से याद किया जाता है। संदेश स्पष्ट है — किसी भी प्राणी का अपमान ईश्वर की रचना का अपमान है।
3. महाभारत का प्रसंग और 'सब भूमि गोपाल की'
लेखक याद दिलाता है कि महाभारत में युधिष्ठिर के साथ अंत तक जाने वाला एकमात्र साथी एक कुत्ता ही था। हमारे यहाँ माना गया है — 'सब भूमि गोपाल की' — इस धरती पर सभी प्राणियों का समान अधिकार है। पर आज मनुष्य ने समुद्र को पीछे धकेलकर, पेड़ों को काटकर, पक्षियों को बेदखल करके बस्तियाँ बसा लीं। प्रकृति इस छेड़छाड़ से नाराज़ है — इसीलिए गरमी में अधिक गरमी, बेवक़्त की बरसातें, ज़लज़ले, सैलाब और नित नए रोग बढ़ते जा रहे हैं। नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है।
4. ग्वालियर से मुंबई — बदलता परिवेश
लेखक अपने अनुभव से बताता है कि ग्वालियर में उसका मकान था, अब मुंबई के वर्सोवा में फ़्लैट है। जहाँ आज वर्सोवा की ऊँची इमारतें हैं, वहाँ कभी दूर तक जंगल था — पेड़ थे, परिंदे थे, दूसरे जानवर थे। अब जंगल कटकर बस्ती बन गया — जिन पक्षियों-जानवरों के घर छिने, उनमें से कुछ शहर छोड़कर भाग गए और जो नहीं भाग सके, वे यहाँ-वहाँ डेरा डालकर रहने लगे। समुद्र भी लगातार सिमटता गया — पहले उसने अपनी टाँगें समेटीं, फिर उकड़ूँ बैठा, फिर खड़ा हो गया; और जब जगह कम पड़ी तो उसने अपनी लहरों पर दौड़ते जहाज़ों को तीन टापुओं (एलिफेंटा आदि) की ओर उछाल दिया। प्रकृति के इस गुस्से का यह प्रतीकात्मक चित्रण है।
5. माँ की सीख — कबूतरों का घोंसला
ग्वालियर के मकान में एक बार दालान के रोशनदान में कबूतर के जोड़े ने घोंसला बना रखा था। बिल्ली के उचककर मारे गए हमले में एक अंडा टूट गया; दूसरा अंडा लेखक की माँ ने बचाने की कोशिश में हाथ से गिरकर तोड़ दिया। इस दुख में माँ ने पूरे दिन रोज़ा रखा, दिन-भर कुछ नहीं खाया और शाम को नमाज़ पढ़कर खुदा से इस ग़लती की माफ़ी माँगती रहीं — कबूतरों की आँखों के दुख को उन्होंने अपना दुख माना। यही सच्ची करुणा है — दूसरे के दुख से दुखी होना।
6. आज का मुंबई — 'डेरा डालने' की मजबूरी
आज लेखक के वर्सोवा वाले फ़्लैट में कबूतर फिर आते हैं — मगर अब स्थितियाँ उलट हैं। वे खिड़की के भीतर आकर आले में अंडे देते हैं, चीज़ें गिराते हैं, परेशान करते हैं। नतीजा — लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली लगवानी पड़ी, कबूतरों के बच्चों को खिलौने की तरह उठाकर बाहर किया गया, उनकी रोटी-पानी की सुविधा हटा दी गई। अब कबूतर जाली के बाहर बैठकर भीतर झाँकते रहते हैं। लेखक सोचता है — पहले मनुष्य पक्षियों का दुख बाँटता था, अब उन्हें बेदखल करता है। इसी कसक से पाठ का शीर्षक निकला है — अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले। अंत में सोलोमन और नूह जैसी करुणा, और माँ जैसे रोज़ा रखने वाले लोग अब कहाँ मिलते हैं!
संदेश / उद्देश्य
- धरती केवल मनुष्य की नहीं — सभी प्राणियों का उस पर समान अधिकार है ('सब भूमि गोपाल की')।
- प्रकृति और अन्य जीवों के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम — प्रदूषण, प्राकृतिक आपदाएँ, असंतुलन — मनुष्य को ही भुगतने पड़ते हैं।
- करुणा, सहानुभूति और सह-अस्तित्व ही मानवता की असली पहचान है; बड़े-बड़े बुज़ुर्गों (सुलेमान, नूह) की महानता उनकी संवेदनशीलता में थी।
- बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने मनुष्य को आत्मकेंद्रित और संवेदनहीन बना दिया है — पाठ इसी पर व्यंग्यपूर्ण चिंता है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बाइबिल | ईसाई धर्म का पवित्र ग्रंथ |
| लश्कर | सेना, फ़ौज |
| मज़ार | दरगाह, समाधि |
| लक़ब | उपाधि, पदवी |
| ज़लज़ला | भूकंप |
| सैलाब | बाढ़ |
| दरियादिली | उदारता, दिल की विशालता |
| बेदखल | अधिकार से वंचित करना, निकाल देना |
| डेरा डालना | अस्थायी रूप से रहना |
| आबादी | जनसंख्या, बस्ती |
| रोशनदान | दीवार में हवा-रोशनी के लिए बना झरोखा |
| आला | दीवार में बना ताखा |
| रोज़ा | इस्लाम में व्रत/उपवास |
| वजूद | अस्तित्व |
| उकड़ूँ | घुटने मोड़कर पंजों के बल बैठना |