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Ch 14पतझर में टूटी पत्तियाँ

स्पर्श (गद्य) · रवींद्र केलेकर

पतझर में टूटी पत्तियाँ — रवींद्र केलेकर (निबंध / प्रसंग)

पाठ्यपुस्तक: स्पर्श भाग-2 | विधा: निबंधात्मक प्रसंग (दो लघु प्रसंग — 'गिन्नी का सोना' और 'झेन की देन') | कोड 085, हिंदी पाठ्यक्रम-ब

लेखक परिचय

रवींद्र केलेकर (1925–2010) का जन्म कोंकण क्षेत्र (गोवा) में हुआ। छात्र जीवन से ही वे गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल रहे और गांधीवादी चिंतन से गहरे प्रभावित हुए। उन्होंने कोंकणी, मराठी और हिंदी में लेखन किया; कोंकणी के तो वे शीर्षस्थ साहित्यकार माने जाते हैं और उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (2006) से सम्मानित किया गया। 'उजवाढाचे सूर', 'समिधा', 'सांगली ओथांबे' (कोंकणी) तथा 'कोंकणीचें राजकरण' आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उनके लघु निबंध छोटे कलेवर में जीवन के बड़े सत्य सहजता से कह देते हैं — प्रस्तुत पाठ के दोनों प्रसंग इसी शैली के उदाहरण हैं।

विस्तृत सारांश

प्रसंग 1 — गिन्नी का सोना

शुद्ध सोना और गिन्नी का सोना

लेखक शुद्ध सोने और गिन्नी के सोने का अंतर समझाता है। शुद्ध सोना बिलकुल खरा होता है, पर गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया जाता है, इसीलिए वह अधिक चमकता है और अधिक मज़बूत भी होता है। औरतें प्रायः इसी सोने के गहने बनवा लेती हैं। इसी तरह शुद्ध आदर्श शुद्ध सोने जैसे होते हैं; जब उनमें व्यावहारिकता का ताँबा मिल जाता है तो वे 'प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट' (व्यावहारिक आदर्शवादी) बन जाते हैं।

व्यावहारिकता बनाम आदर्श

लेखक चेतावनी देता है कि व्यावहारिक आदर्शवादियों के जीवन से धीरे-धीरे आदर्श पीछे हटते जाते हैं और व्यावहारिकता ही सोना बनकर आगे आ जाती है — ताँबा ही रह जाता है, सोना गायब हो जाता है। ऐसे लोग 'समाज को ऊपर नहीं उठाते, बल्कि समाज के स्तर तक स्वयं उतर आते हैं।' समाज को शाश्वत मूल्य तो आदर्शवादी लोगों ने ही दिए हैं; व्यवहारवादी लोग तो केवल अपना लाभ देखते हैं और सजग रहकर लाभ-हानि का हिसाब लगाते हुए आगे बढ़ते हैं।

गांधीजी का उदाहरण

लेखक के अनुसार गांधीजी कभी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर नहीं उतरने देते थे, बल्कि व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक चढ़ाते थे। वे 'सोने में ताँबा' नहीं, 'ताँबे में सोना' मिलाकर चलते थे — इसीलिए सोना ही हमेशा आगे रहा। यही कारण है कि गांधीजी अकेले चले थे, पर पीछे लाखों लोग उनके साथ हो लिए और देश आज़ाद हुआ। पाठ का निष्कर्ष — जीवन में व्यावहारिकता आवश्यक हो सकती है, पर नेतृत्व और दिशा हमेशा आदर्शों के हाथ में रहनी चाहिए।

प्रसंग 2 — झेन की देन

जापान की बीमारी

लेखक जापान यात्रा पर अपने मित्र से पूछता है कि यहाँ के लोगों को कौन-सी बीमारियाँ अधिक होती हैं। मित्र बताता है — मानसिक बीमारियाँ; अस्सी फ़ीसदी लोग मनोरुग्ण हैं। कारण? जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है — लोग चलते नहीं, दौड़ते हैं; बोलते नहीं, बकते हैं। महीने का काम एक दिन में पूरा करने की कोशिश करते हैं। अमेरिका से प्रतिस्पर्धा में जापान का दिमाग़ 'स्पीड' के इंजन पर चलने लगा है, और तनाव बढ़ने से वह इंजन टूट जाता है — मानसिक रोग यहीं से शुरू होते हैं।

टी-सेरेमनी (चा-नो-यू) का अनुभव

शाम को मित्र लेखक को जापान की प्रसिद्ध टी-सेरेमनी'चा-नो-यू' — में ले जाता है। यह चाय पीने की एक विशेष झेन-विधि है। पर्णकुटी जैसी सजी हुई शांत जगह पर 'चाजीन' (चाय पिलाने वाला विधिपूर्वक अनुष्ठान करने वाला व्यक्ति) ने झुककर उनका स्वागत किया। वहाँ अत्यंत शांति थी — अँगीठी पर चढ़ी केतली के पानी का उबलना तक सुनाई दे रहा था। यहाँ एक बार में तीन से अधिक लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। चाजीन ने बेहद धीमी, शांत और गरिमापूर्ण भंगिमाओं में चाय बनाई और प्यालों में दो-तीन घूँट चाय दी, जिसे उन्होंने डेढ़ घंटे तक बूँद-बूँद चुसकियों में पिया।

वर्तमान क्षण में जीना

इस शांति में लेखक को लगा मानो उसके दिमाग़ की रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती गई और फिर बिलकुल बंद हो गई। उसे अनुभव हुआ कि वह अनंतकाल जितने विस्तृत काल में जी रहा है। लेखक निष्कर्ष निकालता है — हम या तो बीते हुए दिनों (भूतकाल) में रहते हैं या आने वाले दिनों (भविष्य) के सपनों में; दोनों ही मिथ्या हैं। सत्य केवल वर्तमान है — उसी में जीना चाहिए। जो व्यक्ति वर्तमान क्षण में जीता है, वही सच्चे अर्थों में जीता है। यही झेन परंपरा की भारत को/संसार को बड़ी देन है।

शीर्षक की सार्थकता

जैसे पतझर में टूटी पत्तियाँ देखने में छोटी-बिखरी होती हैं पर अपने पीछे पूरे मौसम का सत्य समेटे रहती हैं, वैसे ही ये दोनों छोटे-छोटे प्रसंग जीवन के बड़े सत्य — आदर्शों की रक्षा और वर्तमान में जीने की कला — सहज रूप में दे जाते हैं। छोटे कलेवर में गहरी सीख — यही शीर्षक का मर्म है।

संदेश / उद्देश्य

  • शुद्ध आदर्श ही समाज को शाश्वत मूल्य देते हैं; व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक उठाना चाहिए, आदर्शों को व्यावहारिकता तक नहीं गिराना चाहिए।
  • गांधीजी की तरह 'ताँबे में सोना' मिलाने की जीवन-दृष्टि अपनाएँ।
  • भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा से उपजा तनाव मानसिक रोगों की जड़ है; मन की शांति के लिए जीवन की गति धीमी करना सीखें।
  • भूत और भविष्य मिथ्या हैं — वर्तमान ही सत्य है; वर्तमान में जीना ही सच्चा जीवन है।
परीक्षा टिप: इस पाठ से लगभग तय प्रश्न — (1) शुद्ध सोना और गिन्नी के सोने का अंतर तथा उसका प्रतीकार्थ, (2) 'प्रैक्टिकल आइडियलिस्ट' किसे कहते हैं और लेखक उनके बारे में क्या मानता है, (3) गांधीजी 'ताँबे में सोना' कैसे मिलाते थे, (4) जापान में मानसिक रोगों के कारण, (5) टी-सेरेमनी/चा-नो-यू का वर्णन और वहाँ तीन से अधिक लोग क्यों नहीं, (6) 'वर्तमान ही सत्य है' का आशय। दोनों प्रसंगों के नाम और क्रम याद रखें — 1 अंक के प्रश्न में पूछा जाता है कि 'झेन की देन' किस देश की जीवन-पद्धति से जुड़ा है (उत्तर: जापान)।

कठिन शब्दार्थ

शब्दअर्थ
गिन्नीसोने का सिक्का (गिनी)
खराशुद्ध, बिना मिलावट का
आदर्शवादीआदर्शों/उच्च मूल्यों पर चलने वाला
व्यावहारिकताव्यवहार में लाने योग्य सूझबूझ, प्रैक्टिकल दृष्टि
शाश्वत मूल्यसदा बने रहने वाले जीवन-मूल्य
सजगसचेत, सावधान
मनोरुग्णमानसिक रूप से बीमार
प्रतिस्पर्धाहोड़, मुकाबला
चा-नो-यूजापानी टी-सेरेमनी का नाम
चाजीनटी-सेरेमनी कराने वाला विधि-विशेषज्ञ
पर्णकुटीपत्तों से बनी कुटिया
भंगिमामुद्रा, अंदाज़
अनंतकालजिसका अंत न हो, असीम समय
मिथ्याझूठ, असत्य
झेनबौद्ध धर्म की ध्यान-प्रधान जापानी शाखा