हरिहर काका — मिथिलेश्वर (कहानी)
पाठ्यपुस्तक: संचयन भाग-2 | विधा: कहानी | पाठ-क्रम: 16 (कोड 085, हिंदी पाठ्यक्रम-ब)
लेखक परिचय
मिथिलेश्वर का जन्म सन् 1950 में बिहार के भोजपुर जिले के बैसाडीह गाँव में हुआ। वे हिंदी के उन प्रमुख कथाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन के यथार्थ को केंद्र में रखकर लेखन किया। उनकी कहानियों में गाँव की बदलती सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ, टूटते पारिवारिक संबंध और साधारण मनुष्य का संघर्ष बड़ी प्रामाणिकता से चित्रित होता है। 'बाबूजी', 'टूटते परिवेश' जैसे कथा-संग्रह तथा 'यह अंत नहीं', 'सुरंग में सुबह' जैसे उपन्यास उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। सहज-सरल भाषा और आँचलिक परिवेश की जीवंत पकड़ उनकी शैली की विशेषताएँ हैं।
विस्तृत सारांश
1. कथावाचक और हरिहर काका का संबंध
कहानी का वाचक (लेखक) हरिहर काका के पड़ोस का है। हरिहर काका ने बचपन से ही उसे अपने बेटे की तरह दुलार दिया — कंधे पर बिठाकर घुमाया, प्यार से खिलाया। बड़ा होने पर यही आत्मीयता गहरी मित्रता में बदल गई। गाँव में हरिहर काका ही ऐसे व्यक्ति थे जिनसे वाचक खुलकर बातें करता था, इसीलिए काका के जीवन की एक-एक परत उसके सामने खुलती गई।
2. गाँव की ठाकुरबारी
वाचक के गाँव में एक प्रसिद्ध ठाकुरबारी (ठाकुरजी का मंदिर) है। कहा जाता है कि बहुत पहले एक संत ने वहाँ कुटिया बनाकर ठाकुरजी की पूजा शुरू की थी; धीरे-धीरे गाँववालों ने दान देकर उसे भव्य बना दिया। गाँव के लोग अपनी हर सफलता — फसल, मुकदमा, नौकरी, विवाह — का श्रेय ठाकुरजी को देकर रुपया, अनाज और ज़मीन दान करते रहे। इस तरह ठाकुरबारी के पास काफी संपत्ति और खेत जमा हो गए। महंत, पुजारी और साधु-संत बिना परिश्रम किए आराम का जीवन बिताते थे। धार्मिक आयोजनों के कारण गाँव के जीवन पर ठाकुरबारी का गहरा प्रभाव था।
3. हरिहर काका की पारिवारिक स्थिति
हरिहर काका चार भाई हैं और परिवार के पास कुल साठ बीघे खेत हैं — यानी हर भाई के हिस्से लगभग पंद्रह बीघे। काका की दो शादियाँ हुईं, पर दोनों पत्नियाँ संतान दिए बिना चल बसीं। उन्होंने तीसरी शादी नहीं की और भाइयों के परिवार के साथ रहने लगे। शुरू में भाइयों की पत्नियों ने उनकी खूब सेवा की, पर धीरे-धीरे असलियत सामने आ गई — काका को बचा-खुचा, बासी और रूखा-सूखा भोजन मिलने लगा; बीमारी में कोई पूछने वाला नहीं रहा। काका समझ गए कि सेवा उनकी नहीं, उनकी पंद्रह बीघे ज़मीन की हो रही थी।
4. महंत का जाल
घर की उपेक्षा से दुखी होकर एक दिन काका ने अपनी व्यथा किसी से कही और बात ठाकुरबारी के महंत तक पहुँच गई। महंत ने अवसर ताड़कर काका को ठाकुरबारी बुलाया और समझाया — भाई-भतीजे कोई अपने नहीं होते, यह सब मोह-माया है; अपनी ज़मीन ठाकुरजी के नाम लिख दो, जीवन भर आराम रहेगा और मरने के बाद सीधे बैकुंठ मिलेगा। ठाकुरबारी में काका की खूब आवभगत हुई — दोनों समय हलवा, पूड़ियाँ, खीर, मालपुए मिलने लगे। काका को लगा कि यहीं सुख है।
5. भाइयों की चालाकी और काका का निश्चय
खबर मिलते ही भाई हाथ-पैर जोड़कर काका को घर लौटा लाए। पत्नियों को डाँटा गया और काका को फिर स्वादिष्ट भोजन और सेवा मिलने लगी। पर अब भाइयों ने भी दबाव डालना शुरू किया कि ज़मीन उनके नाम लिख दी जाए। काका दोनों पक्षों की स्वार्थ-लीला समझ चुके थे। उन्हें गाँव की एक वृद्धा की याद आई जिसने जीते-जी अपनी संपत्ति बेटे के नाम लिख दी थी और फिर बेटे-बहू ने उसे दुत्कार कर घर से निकाल दिया था। काका ने ठान लिया कि जीते-जी वे अपनी ज़मीन किसी के नाम नहीं लिखेंगे।
6. अपहरण, ज़बरदस्ती और पुलिस
इनकार सुनकर दोनों पक्ष हिंसा पर उतर आए। भाइयों ने घर में काका के साथ मारपीट कर कागज़ों पर ज़बरदस्ती अँगूठे के निशान लेने चाहे। दूसरी ओर महंत के आदमी एक रात काका को उठा ले गए; ठाकुरबारी में उनके मुँह में कपड़ा ठूँसकर, हाथ-पैर बाँधकर सादे कागज़ों पर जबरन अँगूठे के निशान लिए गए और उन्हें कोठरी में बंद कर दिया गया। भाइयों की सूचना पर पुलिस ने काका को छुड़ाया। काका ने पुलिस के सामने पूरी सच्चाई कह दी, जिससे महंत और भाइयों — दोनों की कलई खुल गई। गाँव दो दलों में बँट गया — एक महंत के पक्ष में, दूसरा भाइयों के।
7. कहानी का अंत
अब हरिहर काका अपने हिस्से का अलग इंतज़ाम करके रहते हैं। उनकी जान को खतरा बना रहता है, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए राइफलधारी सिपाही तैनात हैं। इतना सब झेलकर काका भीतर से टूट चुके हैं — वे अब प्रायः मौन रहते हैं, न किसी से बोलते हैं, न जीवन में कोई रस लेते हैं। वाचक उनकी यह दशा देखकर व्यथित होता है। कहानी इस कड़वे यथार्थ पर समाप्त होती है कि ज़मीन-जायदाद के लालच ने रिश्तों और धर्म — दोनों को खोखला कर दिया है।
मुख्य पात्र / चरित्र-चित्रण
- हरिहर काका — कहानी के केंद्रीय पात्र; सीधे-सादे, स्नेही और स्वाभिमानी वृद्ध किसान। नि:संतान होने के कारण परिवार और समाज दोनों के शोषण के शिकार। अनुभव से सीखकर विवेकपूर्ण निर्णय लेते हैं (जीते-जी ज़मीन न लिखना), पर अंत में यातनाओं से टूटकर मौन हो जाते हैं। वे भारतीय ग्रामीण समाज के उपेक्षित वृद्धों के प्रतीक हैं।
- महंत — धर्म की आड़ में संपत्ति हड़पने वाला धूर्त, लोभी और अवसरवादी व्यक्ति; मीठी वाणी से जाल बिछाता है और असफल होने पर अपहरण-हिंसा तक उतर आता है। धार्मिक पाखंड का प्रतिनिधि।
- हरिहर काका के भाई — स्वार्थी और लालची; उनका प्रेम-सेवा सब ज़मीन पाने का दिखावा है। ज़रूरत पड़ने पर वे भी हिंसा का सहारा लेते हैं।
- कथावाचक — संवेदनशील, काका के प्रति सच्ची आत्मीयता रखने वाला युवक; कहानी उसी की दृष्टि से कही गई है।
संदेश / उद्देश्य
- ज़मीन-जायदाद का लोभ खून के रिश्तों को भी खोखला कर देता है; संबंधों का आधार स्वार्थ बनता जा रहा है।
- धर्म और आस्था की आड़ में भोले-भाले लोगों का आर्थिक शोषण होता है — धार्मिक पाखंड पर तीखा प्रहार।
- नि:संतान और असहाय वृद्धों की सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न — बुज़ुर्गों की सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए।
- संपत्ति संबंधी निर्णय सोच-समझकर लेने चाहिए; जीते-जी सब कुछ किसी के नाम लिख देना घातक हो सकता है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ठाकुरबारी | ठाकुरजी (देवता) का मंदिर |
| महंत | मठ या मंदिर का प्रधान |
| मोह-माया | सांसारिक आसक्ति, लगाव |
| बैकुंठ | विष्णु का लोक, स्वर्ग |
| आसक्ति | गहरा लगाव |
| विलक्षण | असाधारण, अनोखा |
| आवभगत | आदर-सत्कार, खातिरदारी |
| दुत्कारना | अपमानपूर्वक भगा देना |
| यातना | घोर कष्ट, पीड़ा |
| हस्तक्षेप | दखल देना |
| सुयोग | अच्छा अवसर |
| मझधार | बीच धारा में (संकट की स्थिति) |