सपनों के-से दिन — गुरदयाल सिंह (संस्मरणात्मक कहानी)
पाठ्यपुस्तक: संचयन भाग-2 | विधा: संस्मरणात्मक कहानी | पाठ-क्रम: 17 (कोड 085, हिंदी पाठ्यक्रम-ब)
लेखक परिचय
गुरदयाल सिंह (जन्म: सन् 1933, जैतो, पंजाब) पंजाबी के शीर्षस्थ कथाकार हैं। साधारण किसान परिवार में जन्मे गुरदयाल सिंह ने कठिन परिश्रम से शिक्षा पाई और अध्यापक बने। उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'मढ़ी दा दीवा' (हिंदी में 'मरही का दीया') पंजाबी कथा-साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है। 'अणहोए', 'परसा' आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999) से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं में ग्रामीण पंजाब का जीवन, साधारण मनुष्य की पीड़ा और बाल-मन का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। प्रस्तुत पाठ में उन्होंने अपने बचपन और स्कूली दिनों की खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बड़ी आत्मीयता से लिखी हैं।
विस्तृत सारांश
1. बचपन के खेल-साथी
लेखक बचपन में अपने मोहल्ले के जिन बच्चों के साथ खेलते थे, वे सब गरीब परिवारों के थे — किसी के पिता छोटे किसान थे तो किसी के मंडी में आढ़तियों के पल्लेदार। सब बच्चे नंगे पाँव, फटी-मैली कच्छी और टूटे बटनों वाले कुर्ते पहने, बिखरे बालों में धूल-मिट्टी में खेलते थे। खेलते-कूदते चोट लगती, पैर के अँगूठे से खून बहने लगता, पर परवाह कोई नहीं करता था। घर लौटने पर माँ-बहनें मरहम-पट्टी करने के बजाय और पिता उल्टे पिटाई कर देते थे, फिर भी अगले दिन सब बच्चे फिर खेलने पहुँच जाते थे। लेखक कहते हैं कि तब यह समझ नहीं थी कि सब बच्चों के खेलने का आनंद एक जैसा ही होता है — चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या प्रांत के हों। बाद में अध्यापक बनकर तथा 'स्काउटिंग' की ट्रेनिंग में उन्होंने अनुभव किया कि राजस्थान या हरियाणा से आए बच्चे भी, जिनकी बोली कम समझ आती थी, खेलते समय वैसी ही बोली और भाव-भंगिमा से बात करते थे। बाल-मन की एकता पाठ का पहला सूत्र है।
2. पढ़ाई के प्रति परिवारों की उदासीनता
उस समय अधिकांश माता-पिता बच्चों की पढ़ाई को ज़रूरी नहीं समझते थे। अनपढ़ किसान-परिवारों के लोग कहते कि पढ़-लिखकर कौन-सा तहसीलदार बन जाएगा; बच्चा काम-धंधे में हाथ बँटाए, यही अच्छा है। जो बच्चे स्कूल भेजे भी जाते, उनमें से अधिकतर का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। कई बच्चे बस्ता तालाब में फेंक आते और भाग जाते। लेखक स्वयं भी स्कूल जाने में रोते-चिल्लाते थे। राशन के काम या घर के कामों के बहाने पढ़ाई छुड़ा दी जाती थी।
3. स्कूल का डरावना और सुहावना रूप
लेखक का स्कूल छोटा-सा था — छोटे-छोटे कमरे, सामने बरामदे। स्कूल की प्रार्थना-सभा और खेल की घंटी बच्चों को अच्छी लगती थी, पर पढ़ाई और अध्यापकों की घुड़कियों-मार का भय हमेशा बना रहता था। नयी श्रेणी (कक्षा) में जाने का उत्साह पहले दिन ही ठंडा पड़ जाता था, क्योंकि नयी कक्षा का अर्थ था — नयी कठिन पढ़ाई और नए मास्टरों की मार। लेखक को नयी कक्षा की एक बात अच्छी लगती थी — हेडमास्टर शर्मा जी उन्हें अपने बेटे की पुरानी पुस्तकें दे देते थे। उन पुरानी किताबों की विशेष गंध लेखक को आज भी याद है; उसी गंध से उन्हें स्कूल की पढ़ाई याद आ जाती थी।
4. छुट्टियों के दिन और 'काम' का पहाड़
गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होते ही बच्चे खूब खेलते, नानी-दादी के घर जाते, तालाब में नहाते। पर जैसे-जैसे छुट्टियाँ बीतने लगतीं, स्कूल से मिले काम का ध्यान सताने लगता। बच्चे हिसाब लगाते कि कितने दिन बचे हैं और रोज़ कितने सवाल करने पर काम पूरा हो जाएगा; पर खेल के आकर्षण में गिनती का यह गणित रोज़ आगे खिसकता जाता। अंत में मार खाना, अध्यापकों की 'घुड़कियाँ' सहना ही सस्ता सौदा लगने लगता — बच्चे सोचते कि काम करने से तो पिटाई सह लेना ही ठीक है। 'भागे हुए स्कूली बच्चों' की तरह उनका मन भी बहाने ढूँढ़ता रहता।
5. मास्टर प्रीतमचंद और अनुशासन का आतंक
स्कूल के पीटी मास्टर प्रीतमचंद बेहद सख्त थे — ठिगना कद, दुबला-पतला पर गठीला शरीर, माता के दानों से चेचकरू चेहरा, बाज़ जैसी तेज़ आँखें, खाकी वर्दी, चमड़े के चौड़े पंजों वाले बूट। पूरी प्रार्थना-सभा में बच्चों की पंक्तियाँ सीधी रखने के लिए वे डंडा लिए घूमते रहते; ज़रा भी हिलने पर बच्चों की खाल 'खींच' लेते थे। एक दिन चौथी कक्षा की फ़ारसी के घंटे में जब बच्चे शब्द-रूप याद करके नहीं आए, तो प्रीतमचंद ने उन्हें मुर्गा बनाकर पीठ ऊँची रखने की यातना दी। यह क्रूरता देखकर हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा ने उन्हें तुरंत निलंबित (मुअत्तल) कर दिया। बच्चों को विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके 'जल्लाद' समझे जाने वाले मास्टर को भी कोई दंड दे सकता है।
6. प्रीतमचंद का दूसरा रूप
निलंबन के दिनों में बच्चों ने प्रीतमचंद का दूसरा ही रूप देखा — वे अपने किराए के अँधेरे से कमरे में आराम से बैठे पिंजरे के तोतों को भीगे हुए बादाम की गिरियाँ खिला रहे थे और उनसे मीठी बातें कर रहे थे। बच्चे हैरान थे कि जो व्यक्ति बच्चों की चमड़ी उधेड़ने में नहीं हिचकता, वह तोतों से इतना प्रेम कैसे करता है! यह प्रसंग मानव-स्वभाव की जटिलता दिखाता है। बाद में नाभा से शिक्षा-विभाग के निर्देश पर उनका निलंबन रद्द हुआ और वे फिर स्कूल आ गए।
7. स्काउटिंग की परेड — स्कूल का आनंद
स्कूल की जो एक चीज़ लेखक को सचमुच अच्छी लगती थी, वह थी स्काउटिंग की परेड। धुली हुई वर्दी — नीली-पीली झंडियाँ लेकर 'राइट टर्न', 'लेफ़्ट टर्न', 'अबाउट टर्न' करते हुए बच्चे जब ठक-ठक बूट बजाते चलते और प्रीतमचंद 'शाबाश' कहते, तो लेखक को अपनी 'शाबाश' फ़ौज के तमगों जैसी लगती थी। तब स्कूल जाना अच्छा लगने लगता था और बच्चे स्वयं को महत्वपूर्ण महसूस करते थे।
प्रमुख पात्र व चरित्र-चित्रण
- लेखक (बाल गुरदयाल सिंह) — संवेदनशील, खेल-प्रेमी, स्कूल से डरने वाला किंतु स्काउट परेड और पुरानी किताबों की गंध से जुड़ाव रखने वाला सामान्य बालक; उसकी स्मृतियों में पूरा बचपन जीवंत हो उठा है।
- मास्टर प्रीतमचंद — पीटी मास्टर; कठोर अनुशासनप्रिय, बच्चों के लिए आतंक के पर्याय, पर तोतों के प्रति असीम स्नेह रखने वाले — कठोरता और कोमलता का विचित्र मेल।
- हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा — सौम्य, ममतालु और न्यायप्रिय; लेखक को अपने बेटे की पुरानी पुस्तकें देते थे तथा बच्चों पर अत्याचार देखकर प्रीतमचंद को निलंबित करने का साहसिक निर्णय लेते हैं।
पाठ का संदेश
- बचपन का आनंद जाति, वर्ग, प्रांत और भाषा की सीमाओं से परे एक जैसा होता है।
- शिक्षा भय और मार से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन ('शाबाश') और रुचिकर गतिविधियों (खेल, स्काउटिंग) से प्रभावी बनती है।
- बच्चों को मारना-पीटना अपराध है; हेडमास्टर शर्मा का कदम आज की 'दंड-मुक्त शिक्षा' की अवधारणा का पूर्वाभास है।
- अभिभावकों की शिक्षा के प्रति जागरूकता बच्चों का भविष्य बदल सकती है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पल्लेदार | मंडी में बोरे ढोने वाला मज़दूर |
| आढ़ती | अनाज का थोक व्यापारी |
| घुड़कियाँ | डाँट-डपट, धमकी |
| श्रेणी | कक्षा, दर्जा |
| मुअत्तल | निलंबित (काम से हटाया जाना) |
| चेचकरू | चेचक के दागों वाला (चेहरा) |
| ठिगना | छोटे कद का |
| शब्द-रूप | व्याकरण में शब्दों के रूप (फ़ारसी पाठ) |
| तमगे | पदक, मेडल |
| बालिश्त | लगभग नौ इंच की माप (बित्ता) |
| हरफ़नमौला | हर काम में निपुण |
| निरीक्षण | जाँच-पड़ताल, मुआयना |