टोपी शुक्ला — राही मासूम रज़ा (कहानी)
पाठ्यपुस्तक: संचयन भाग-2 | विधा: कहानी (उपन्यास-अंश) | पाठ-क्रम: 18 (कोड 085, हिंदी पाठ्यक्रम-ब)
लेखक परिचय
राही मासूम रज़ा (जन्म: सन् 1927, गंगौली, ज़िला गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश; निधन: सन् 1992) हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कवि और पटकथा-लेखक थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उन्होंने हिंदी साहित्य में पी-एच.डी. की। 'आधा गाँव', 'टोपी शुक्ला', 'हिम्मत जौनपुरी', 'ओस की बूँद', 'कटरा बी आर्ज़ू' उनके प्रमुख उपन्यास हैं। दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक 'महाभारत' की पटकथा और संवाद लिखकर वे घर-घर में लोकप्रिय हुए। उनका संपूर्ण साहित्य गंगा-जमुनी तहज़ीब अर्थात् हिंदू-मुस्लिम साझी संस्कृति की पैरवी करता है। प्रस्तुत पाठ उनके उपन्यास 'टोपी शुक्ला' का अंश है।
विस्तृत सारांश
1. टोपी और इफ़्फ़न की दोस्ती
कहानी के नायक हैं बलभद्र नारायण शुक्ला उर्फ़ टोपी — एक कट्टर हिंदू ब्राह्मण परिवार का बालक, और उसका घनिष्ठ मित्र इफ़्फ़न — एक धार्मिक मौलवी खानदान का बालक। दोनों की दोस्ती धर्म की दीवारों को नहीं मानती थी। लेखक कहते हैं कि इफ़्फ़न टोपी की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है — दोनों को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। दोनों के परिवार अपने-अपने धर्म और परंपराओं में कट्टर थे, पर बच्चों के निर्मल मन में यह भेद कहीं नहीं था। टोपी के लिए इफ़्फ़न का घर और इफ़्फ़न की दादी का स्नेह ही सबसे बड़ा सहारा था।
2. इफ़्फ़न की दादी
इफ़्फ़न की दादी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक ज़मींदार परिवार की बेटी थीं, जिनका विवाह लखनऊ के मौलवी परिवार में हुआ था। ससुराल में सब कुछ था, पर वे जीवन भर अपने मायके के दूध-दही और खुले वातावरण को तरसती रहीं। घर के सब लोग शुद्ध लखनवी उर्दू बोलते थे, पर दादी सबसे अपनी मायके वाली पूरबी बोली में ही बातें करती थीं — यही बोली टोपी को अपनी माँ जैसी लगती थी। दादी टोपी को बहुत प्यार करती थीं; कहानियाँ सुनातीं और उसे कभी हिंदू-मुसलमान के भेद से नहीं देखती थीं। टोपी अपने घर की कठोर दादी के बदले इफ़्फ़न की दादी को पाना चाहता था — उसने इफ़्फ़न से यहाँ तक कहा कि "तू अपनी दादी को मेरी दादी से बदल ले।" टोपी जो भी कसम खाता, इफ़्फ़न की दादी की ही खाता था।
3. टोपी का अपना घर
टोपी के अपने घर में उसे स्नेह नहीं मिलता था। उसकी दादी सुभद्रादेवी कट्टर विचारों वाली और कठोर स्वभाव की थीं, जिनका घर पर पूरा दबदबा था। माँ रामदुलारी टोपी से प्रेम तो करती थीं, पर घर के वातावरण के आगे विवश थीं। बड़ा भाई मुन्नी बाबू चालाक था और छोटा भैरव अभी बच्चा था। एक दिन खाने की मेज़ पर टोपी के मुँह से 'अम्मी' शब्द निकल गया — मुसलमानों के घर की यह भाषा सुनकर पूरे घर में भूचाल आ गया। दादी ने आसमान सिर पर उठा लिया, मुन्नी बाबू ने चुगली की कि उसने टोपी को एक दिन कबाबची की दुकान पर देखा था, और माँ रामदुलारी ने टोपी की खूब पिटाई की। यह प्रसंग दिखाता है कि बड़ों के मन में जमी धार्मिक कट्टरता बच्चों के निर्मल प्रेम को भी अपराध बना देती है, जबकि भाषा और स्नेह का कोई धर्म नहीं होता।
4. दादी की मृत्यु
दस अक्टूबर सन् 1945 को इफ़्फ़न की दादी का देहांत हो गया। मरते समय भी वे अपने मायके को ही याद करती रहीं। दादी की मृत्यु से इफ़्फ़न के घर का एक कोना खाली हो गया, पर सबसे सूना टोपी हो गया — उस घर में अब उसे अपनापन देने वाला कोई नहीं रहा। इफ़्फ़न को दादी की मौत का दुख था, पर टोपी को उससे भी गहरा — क्योंकि दादी ही उसके अकेलेपन का एकमात्र सहारा थीं।
5. इफ़्फ़न के पिता का तबादला और टोपी की कसम
अगले ही वर्ष दस अक्टूबर सन् 1946 को इफ़्फ़न के पिता का तबादला मुरादाबाद हो गया और इफ़्फ़न सपरिवार चला गया। टोपी नितांत अकेला रह गया। नए आए कलेक्टर के बेटे से उसकी दोस्ती नहीं हो पाई। तब दस वर्ष के टोपी ने कसम खाई कि अब वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगा जिसके पिता की नौकरी बदली वाली हो। बालक की यह कसम उसके भीतर के गहरे अकेलेपन और टूटन की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
6. टोपी की पढ़ाई और अपमान
टोपी घर की उपेक्षा के बीच पढ़ता रहा, पर नवीं कक्षा में वह दो बार फेल हो गया — एक वर्ष उसे टाइफ़ाइड हो गया था और दूसरे वर्ष घर के वातावरण तथा काम-काज ने पढ़ने नहीं दिया। तीसरे वर्ष उसे अपने से छोटी उम्र के बच्चों के साथ बैठना पड़ा। सहपाठी उसका मज़ाक उड़ाते और अध्यापक भी ताने देते — कोई उससे प्रश्न का उत्तर तक नहीं पूछता था; यदि वह उत्तर देना चाहता तो कहा जाता कि तुम तो पिछले साल के पढ़े हुए हो। फेल होने वाले बच्चे की इस मानसिक पीड़ा का ऐसा मार्मिक चित्रण हिंदी साहित्य में विरल है — लेखक संकेत करते हैं कि फेल हुआ बच्चा सहानुभूति का पात्र है, उपहास का नहीं।
प्रमुख पात्र व चरित्र-चित्रण
- टोपी (बलभद्र नारायण शुक्ला) — संवेदनशील, स्नेह का भूखा, निश्छल बालक; अपने ही घर में उपेक्षित। धार्मिक भेदभाव उसकी समझ से परे है। दादी की मृत्यु और इफ़्फ़न के जाने से भीतर तक टूट जाता है; परीक्षा में असफलता उसके अपमान को और गहरा करती है।
- इफ़्फ़न — टोपी का अभिन्न मित्र; सरल, स्नेही और निष्कपट बालक, जो मित्रता में धर्म नहीं देखता।
- इफ़्फ़न की दादी — कहानी की सबसे आत्मीय पात्र; ममता और मानवीयता की मूर्ति। पूरबी बोली बोलने वाली, मायके की स्मृतियों में जीने वाली वृद्धा, जिनका स्नेह धर्म की सीमाएँ नहीं मानता।
- सुभद्रादेवी (टोपी की दादी) — कट्टर, कठोर और रोबीली; इफ़्फ़न की दादी के ठीक विपरीत।
- रामदुलारी — टोपी की माँ; ममतामयी किंतु घर के कट्टर वातावरण के आगे विवश।
पाठ का संदेश
- प्रेम, मित्रता और भाषा का कोई धर्म या जाति नहीं होती; बच्चों का निर्मल मन भेदभाव नहीं जानता।
- हिंदू-मुस्लिम साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) ही भारत की आत्मा है; कट्टरता दोनों ओर के मासूमों को दुख देती है।
- बच्चों को घर में स्नेह और अपनापन मिलना चाहिए; उपेक्षित बालक भावनात्मक सहारा बाहर खोजता है।
- परीक्षा में असफल विद्यार्थी उपहास नहीं, सहानुभूति और प्रोत्साहन का अधिकारी है।
कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तहज़ीब | संस्कृति, सभ्यता |
| ज़मींदार | बड़ी भू-संपत्ति का स्वामी |
| मौलवी | इस्लाम धर्म का विद्वान |
| पूरबी बोली | पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली |
| अम्मी | माँ (उर्दू शब्द) |
| तबादला | स्थानांतरण, बदली |
| कस्टोडियन | संपत्ति का संरक्षक (सरकारी) |
| चुगली | पीठ पीछे शिकायत करना |
| दबदबा | रोब, प्रभुत्व |
| नितांत | बिलकुल, सर्वथा |
| विरल | दुर्लभ, कम मिलने वाला |
| मार्मिक | हृदय को छू लेने वाला |